श्री ब्रज निधि जी की जीवनी (महाराजा सवाई प्रतापसिंह)

श्री ब्रज निधि जी की जीवनी (महाराजा सवाई प्रतापसिंह)

वंश परंपरा और जन्म : 
महाराज प्रतापसिंहजी (ब्रजनिधिजी) सूर्यवंश की प्रख्यात शाखा कछवाहा-वंश के मानों सूर्य ही थे । महाराज श्री रामचंद्रजी से 196 वीं पीढ़ी में राजा सोढ़देवजी हुए, जो अपने वीर पुत्र दूलहरायजी सहित ढूँढाड़ देश में आकर यहाँ के यशस्वी राजा हुए । सोढ़देवजी से 17 वीं पीढ़ी में महाराज पृथीराज जी हुए । पृथीराजजी की वंश-परंपरा में महाराजा भारमलजी, मानसिंहजी, मिर्जा राजा जयसिंहजी, सवाई जयसिंहजी आदि अत्यंत वीर, यशस्वी, बहु-गुण संपन्न और कीर्त्तिमान् नरपति हुए जिनके नाम बल, विद्या, नीति, धर्म-परायणता और धन-संपत्ति आदि के कारण भारतवर्ष में यावच्चंद्र- दिवाकर बने रहेंगे । जयपुर नगर के बसानेवाले, अश्वमेध यज्ञ के कर्त्ता, ज्योतिष यंत्रालय आदि के निर्माण कर्ता, परम प्रवीण सवाई जयसिंहजी के ईश्वरीसिंहजी और उनके माधवसिंहजी उत्तराधिकारी हुए । माधवसिंहजी के प्रथम पुत्र पृथीसिंहजी का जन्म 1762 में हुआ और कनिष्ठ पुत्र प्रतापसिंहजी (ब्रजनिधि जी) का जन्म पौष बदी 2 1762 में हुआ । पृथीसिंहजी की माता का नाम चूँडावतजी था ।
 
बाल्यकाल एवं शिक्षा :
महाराजा सवाई प्रतापसिंह जी का शरीर बहुत सुडौल और सुंदर था । वे न तो बहुत लंबे थे, न बहुत ठिगने; न बहुत मोटे और न बहुत पतले । उनके बदन का रंग गेहुँआ था । उनके शरीर में बल भी पर्याप्त था । बाल्यावस्था में उन्होंने शास्त्र-शिक्षा के साथ साथ युद्ध-विद्या की शिक्षा भी पाई थी, जैसा कि उस जमाने में और उससे पहले राजकुमारों के लिये अनिवार्य नियम था । इनके पिता महाराज माधवसिंहजी का यह निश्चय रहा कि ये दोनों भाई ( पृथीसिंहजी और प्रतापसिंहजी ) हिंदी और संस्कृत के पंडित हो जायँ । अतः उन्होंने इनकी शिक्षा के लिये यथेष्ट प्रबंध किया था।
महाराज माधवसिंहजी और ईश्वरीसिंहजी गुणियों के कुछ कम ग्राहक न थे । अतः कवियों, रसिकों और ईश्वर भक्तों का इनके समय मे भी वैसा ही जमघट था । इस कारण महाराज प्रतापसिंहजी को विद्या संपादन का सुअवसर बना ही रहा । महाराज का स्वभाव भी बहुत अच्छा था । वे हँसमुख, मिलन-सार, उदार और गुण - ग्राहक प्रसिद्ध थे । वे राजनीति में भी पटु थे ।
 
प्रतापसिंह जी (ब्रजनिधि जी) का सिंहासनारूढ़ होना :
माधवसिंह जी के देवलोक गमन के उपरांत उनके बड़े पुत्र पृथीसिंह जी 5 ही वर्ष की आयु में सिंहासन पर विराजे । परंतु 1776 में पृथीसिंह जी देवलोक गामी हो गए । तब उनके छोटे भाई प्रतापसिंहजी वैशाख बदी 3 बुधवार 1778 को गद्दी पर विराजे । ये गद्दी पर बैठने के समय अनुमानतः पंद्रह वर्ष के थे ।
 
विवाह :
महाराजा सवाई प्रतापसिंह जी का विवाह भट्याणी जी से हुआ जिनसे उन्हें एक पुत्र हुआ । पुत्र का नाम जगतसिंह रखा गया ।
 
शासन प्रबंध :
गद्दी पर बैठते ही महाराज प्रतापसिंहजी शासन प्रबंध करने लगे । दुष्ट फीरोज महावत को, जो वृथा ही राजधानी में शहजोर हो रहा था, फौज देकर महाराज प्रतापसिंहजी ने माँचैड़ी के राव पर भेजा और वहीँ उसको ( फीरोज को ) बोहरा खुशालीराम ने जहर देकर मरवा डाला । माता चूँडावतजी की भी परमगति हो गई । माँचैड़ी के राव ने फिर सिर उठाया तब उन्होने फौजकशी करके उसे ठीक किया । परंतु बोहरा खुशालीराम, माँचैड़ीवाले से मिला हुआ था, इस लिए उसने उस राव को कुछ इलाका दिला दिया । इससे देश की कुछ हानि भी हो गई । उधर मराठों का उत्पात बढ़ता जा रहा था । मराठे अपनी चौथ राजस्थानों से वसूल करने का पूर्ण उद्योग करते थे । महाराज प्रतापसिंहजी के पिता महाराज माधवसिंहजी तो मल्हारराव को फौज सहित लाकर जयपुर लेने में सफल हुए ही थे । उस समय का कुछ फौज - खर्च भी बाकी था । इसी से सेंधिया जयपुर पर चढ़ाई करना चाहता था । नीतिमान् महाराजा प्रतापसिंहजी ने यह उपाय सोचा था कि अन्य रजवाड़ों को मिलाकर मराठों को सदा के लिये राजपूताने से निकाल दिया जाय । इसी लिये उन्होंने 1786 में जोधपुर के महाराज विजयसिंहजी के पास दौलतराम हलदिया को भेजकर कहलाया कि यदि आप साथ हों तो मराठों को मारकर निकाल सकते हैं । विजयसिंह जी तो इस बात को चाहते ही थे । उन्होंने तुरंत सेना भेज दी ।1786 ही में दोनों राज्यों की सम्मिलित सेना ने लूँगा (द्यौसा के पास एक कस्बा) की बड़ी लड़ाई में सेंधिया की सेना को ऐसा परास्त किया कि सब मराठों पर राजपूतों की शूरवीरता का आतंक छा गया । परंतु चार ही वर्ष पीछे सेंधिया ने जयपुर पर फिर चढ़ाई की और फिर जयपुर ने राठोड़ों की फौज बुलवाई । पाटण ( तोरावाटी ) के मुकाम पर 1791 में भारी संग्राम हुआ जिसमें पहले तो जयपुर की जीत हुई परंतु पीछे जोधपुर की फौज के चाँपावतों ने, जयपुर वालों के ताने मारने से रुष्ट होकर, सहायता नहीं दी और इस विश्वासघात से हार खानी पड़ी । पाटण की हार के पीछे मौका पाकर होल्कर ने भी फिर चढ़ाई की और उस समय परिस्थिति ठीक न रहने से मराठों से मेल करना पडा । तथापि कभी सेंधिया और कभी होल्कर से लड़ाई-झगडा होता ही रहा जिससे राज्य को बहुत हानि पहुँची । 
जॉर्ज टामस के सफरनामे के हवाले से कविराज श्यामलदानजी ने मराठों और राजपूतों की एक भारी लड़ाई का, फतहपुर ( शेखावाटी ) में, 1799 में, होना लिखा है, जिसमें मराठों की तरफ से उक्त साहब और बामन राव थे तथा कवायद जाननेवाली एक सेना और तोपें भी साथ में थीं । जयपुर की फौज ने उनको भारी शिकस्त दी और उनका बहुत दूर तक पीछा करके बड़ी हानि पहुँचाई । इस लड़ाई में बीकानेर और किशनगढ़ की फौजें भी मदद के लिये आई थीं । तूंगे की विजय के संबंध में कर्नल टॉड साहब ने महाराज प्रतापसिंहजी की बहुत बढ़-चढ़कर प्रशंसा लिखी है -- "महाराज प्रतापसिंह ने स्वयं रणक्षेत्र में सेना का परिचालन किया था । इस कारण उनके पक्ष में यह विजय विशेष प्रशसित मानी गई। तूंगा के इस युद्ध में विजय पाकर महाराज प्रतापसिंहजी ने एक बड़ा उत्सव करके 24 लाख रुपया बाँटा था । इस समर में विजय पाने से आमेराधीश प्रतापसिंह जी के यश का गौरव समस्त रजवाड़ों में फैल गया । प्रतापसिहजी एक महावीर और बुद्धिमान राजा थे ।" परंतु आपस की फूट और दस्यु मराठों की लूट-पाट, पिंडारियों की डकैती और आक्रमण आदि से उस समय जो जो आपत्तियाँ उपस्थित होती रहती थीं उनके निवारण करने में इन महाराज ने जितना उद्योग किया उतना कदाचित् ढूँढाहड़ के किसी भी राजा को न करना पड़ा होगा ।
जयपुर की वंशावली ( ख्यात ) में लिखा है कि सेंधिया पटेल की फतह के पीछे रेवाड़ी के डेरे में बादशाह आया था । वहाँ महाराज उससे मिलने गए । उस समय इनकी बुद्धिमानी और वीरता से बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ और इनसे मंत्री का काम करने के लिये कहा । महाराज ने शिष्टाचार की बातें करके उसे टाल दिया । 
महाराज प्रतापसिंहजी को मराठों आदि के दमन करने और अनेक युद्ध आदि करने में अपने जीवन मे बड़ी बड़ी कठिनाइयाँ भोगनी पड़ी हैं । लड़ाइयों का खर्च और आपत्तियाँ तथा क्लेश कितने उठाने पड़ते हैं, यह बात अनुभवी पुरुषों से छिपी नहीं है ।
जयपुर का खजाना, जो कुबेर का भांडार समझा जाता था, बहुत कुछ इन युद्धों मे खाली हो गया था । महाराज सवाई जयसिंहजी के समय में यह भरा-पूरा था । अश्वमेध यज्ञ, जयपुर- निर्माण और जोधपुर की चढ़ाई तथा अन्य लड़ाइयों में उनके समय में भी इसका एक अंश व्यय हो गया था । फिर ईश्वरीसिंहजी और माधवसिंहजी दोनों भाइयों की लड़ाई में एक बड़ी रकम निकल चुकी थी । अवस्था में भी महाराज प्रतापसिंहजी ने अपनी बुद्धिमानी और नीति-परायणता से सब लड़ाइयों का खर्च चलाया और बहुत वीरता, साहस और योग्यता से उस कठिन काल में राज्य की रक्षा की जब भारतवर्ष गहरे विप्लवों में डूबा हुआ था और यह राज्य शत्रुओं से समय-समय पर आक्रांत और त्रस्त होता था । भारतवर्ष में यह युगांतर या युग परिवर्तन का समय था, जिसका हाल इतिहास पढ़नेवालों को भली भाँति विदित हैं ।
 
प्रसिद्ध निर्माण कार्य [हवा महल जयपुर इत्यादि] :
महाराज प्रतापसिंहजी के समय में इमारतें भी बहुत बनी थीं; उदाहरणार्थ चंद्रमहल में कई विशाल भवन, रिधसिधपाल, बढ़ा दीवानखाना, श्री गोविंदजी के पिछाड़ी का हौज, हवामहल, श्री गोवर्धननाथजी का मंदिर, श्री ब्रजराजविहारीजी का मंदिर, ठाकुर श्री ब्रजनिधिजी का मंदिर, श्री प्रतापेश्वरजी महादेव का मंदिर, खास महलों से हवामहल तक सुरंग, श्री मदनमोहनजी का मंदिर इत्यादि । जयपुर के यंत्रालय की मरम्मत भी हुई । किलों की मरम्मत कराई गई और नई तोपें इत्यादि बनवाई गई । 'हवामहल' की कारीगरी संसार में प्रसिद्ध है। हवामहल पर इनका प्रेम था । इसके निर्माण में इनकी भगवद्भक्ति भी कारणीभूत थी, जैसा कि महाराज ने “ श्रीब्रजनिधि-मुक्तावली" में लिखा है-
 
हवामहल यातें कियो, सब समझो यह भाव ।
राधे कृष्ण सिधारसी, दरस परस को हाव ॥
 
गुरु दीक्षा :
अखिल भारतीय जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्यपीठ पर जब श्री 'श्रीजी' श्रीसर्वेश्वरशरणदेवाचार्यजी महाराज अभिषिक्त हुए, तब कुछ समय बाद वे जयपुर पधारे, जहाँ महाराजा प्रतापसिंहजी ने उनसे वैष्णवी दीक्षा लेकर उनका विशेष मान-सम्मान किया और उनकी आज्ञानुसार अन्यान्य वैष्णव सम्प्रदायों के महान्त सन्तों का भी समुचित सत्कार किया, इस सम्बन्ध में जयपुर के प्रख्यात कवि श्रीमंडनभट्टजी ने श्री सर्वेश्वरशरणदेवाचार्यजी के प्रसंग में लिखा है -
 
माधव महीन्द्र सुत श्रीप्रताप,
बुलवाय किये गुरु करि मिलाप ।
निज महल बीच मन्दिर बनाय,
तामें पधराये शिर नवाय ।
राधानन्दनन्दन भक्तिभाव,
सीखे प्रताप नृप रचि सुभाव ।
कर दिये रघुकुल के गुरु गनेश,
साँचे सेवक हुव प्रतापेश ।
तिन गुरु चरनन को योग पाय,
दिये सम्प्रदाय चारों जमाय ॥
 
महाराज ब्रजनिधि जी को भगवद्भक्ति का चसका लगानेवालों में प्रधान 'जगन्नाथ भट्ट' (किशोरी अली) थे जिनकी स्तुति में महाराज ने लिखा है -
मैं कहौं कहा अब कृपा तुम्हारी ।
याहि कृपा करि गुर मै पाए जगन्नाथ उपकारी ॥
जातें मेरी लगन लगी है ताकौ देत मिला री ।
"ब्रजनिधि" राज साँवरो ढोटा ताकौ दिए बता री ॥
- हरिपद - संग्रह 191
 
भट्टजी के सिवा 'बंसीअली', आदि भक्ति रस पीयूष को बढ़ानेवाले और विद्वान् भी थे ।
 
अपने इष्ट से प्रेम एवं प्रत्यक्ष दर्शन :
जिस तरह बाह्य शत्रुओं को विजय करने का महाराज ब्रजनिधि जी को वह युग प्राप्त था वैसे ही आभ्यंतर शत्रुओं ( क्रोध आदि) को जीतने, भगवान् की भक्ति करने और उत्तम पुरुषों और गुणियों के सत्संग का शुभ अवसर भी उन्हे प्राप्त था, जिसके लिये उनके हृदय मे सदा उमंग रहा करती थी । श्री राधा-गोविंदजी महाराज के चरणारविंदों में महाराज की अटल
अनन्य भक्ति थी । उन्हीं की कृपा से इनको भक्ति का लाभ हुआ और उस भक्ति के उद्गार में अनेक ग्रंथों की रचना हुई । महाराज ब्रजनिधि जी राधा-गोविंदजी को दंडवत् करते और दर्शनों के पीछे नित्य स्तुति या पद सुनाते, जिनकी नित्य नई रचना स्वयं करते थे । विशेष अवसर और उत्सवों पर बहुत समारोह से आनंद का समाज कराते । रास लीलाएँ कराते। कहते हैं कि श्री गोविंददेवजी इनको बाल रूप और किशोर रूप से प्रत्यक्ष दर्शन देते थे । इनके पदों से भी यह बात विदित होती है, जिनमें इस प्रत्यक्ष दर्शन का उल्लेख है । यथा-
 
रेखता
गुलदावदी बहार बीच यार खुश खड़ा था ।
गुलजार गुल सनम की गुल से भी गुल पड़ा था ॥
पोशाक रंग हवासि सज के धज का तड़तड़ा था |
पुखराज का भी जेवर नख-सिख अजब जड़ा था ॥
वह नूर का जहूर अदा पर लड़झड़ा था ।
देखते ही मैने जिसको ऐन अड़बड़ा था ॥
दिल का दलेल दिलबर दिल चोरने अड़ा था ।
'ब्रजनिधि' है वोही दधि पर छल-बल से छुक लड़ा था ॥
- रेखता-संग्रह 168
 
ठाकुर श्री ब्रजनिधि जी की स्थापना :
किसी ऐसे अपराध के कारण कुछ वर्षों पीछे श्री ठाकुरजी के प्रत्यक्ष दर्शन बंद हो गए जिन्हें केवल महाराजा सवाई प्रतापसिंह जी ही जानते थे । उस समय महाराज बहुत व्याकुल हुए । तब स्वप्न में इनको यह आज्ञा हुई कि " तू अपने प्रेम के अनुसार मेरी पृथक् प्रतिमा बना और महलों के समीप मंदिर बनाकर उसमें विराजमान करा, वहाँ तुझे दर्शन हुआ करेंगे ।" अतः महाराज ने श्री ब्रजनिधिजी की श्याममूर्त्ति अपने पूर्ण प्रेम से बनवाई । कोई कोई कहते हैं कि मूर्ति का मुखारविंद महाराज ने अपने हाथ से कोरा । फिर मंदिर में पाटोत्सव की जो प्रतिष्ठा हुई उसका बड़ा उत्सव हुआ और 'दौलतरामजी' हलदिया के यहाँ प्रिया-प्रियतम ( राधा - कृष्ण ) का विवाह हुआ । अर्थात् उनके यहाँ जाकर ठाकुर श्री ब्रजनिधिजी का विवाह होने पर प्रियाजी मंदिर में पधारीं । बेटी के विवाह में जितनी बातें आवश्यक होती हैं वे सब दौलतरामजी ने बड़े खर्च और उत्साह से कीं । और फिर सदा सब त्योहारों पर बेटी को जो वस्त्र, आभूषण, छप्पन भोग, छत्तीस व्यंजन आदि भेजा करते हैं वे भी भेजते रहे । अद्यापि उनके वंशज तीजों का सिजारा आदि मंदिर में भेजते हैं ।
श्री गोविंददेवजी को ब्रजनिधिजी महाराज ने स्वयं अपना इष्टदेव बताया है, जैसा कि इन छंदों से स्पष्ट विदित है ।
 
(बिहाग)
हमारे इष्ट है गोबिंद |
राधिका सुख-साधिका सँग रमत बन स्वच्छंद ॥
हिये नित- प्रति बसौ 'व्रजनिधि' भावती नँदलाल ॥
- हरि-पद-संग्रह 163
 
श्री ठाकुर जी का प्रतापसिंह जी को "ब्रजनिधि" नाम प्रदान करना :
"ब्रजनिधि" उपनाम भी महाराजा सवाई प्रतापसिंह जी को श्री ठाकुरजी ने प्रदान किया था । महाराज ने इसी बात को इस प्रकार कहा है । यथा-
 
रेखता
दिल तड़पता है हुस्न तेरे को ।
कब मिलेगा मुझे सलोना स्याम ॥
अब तो जल्दी से आ दरस दीजै ।
जो इनायत किया है 'ब्रजनिधि' नाम ॥
- हरि-पद-संग्रह 165
 
सोरठ (देव गंधार धीमा छीत )
सांची प्रीति सों बस स्याम ।
धर्यौ 'ब्रजनिधि' नाम तौ अब लीजिए चित चोरि ॥
- हरि-पद-संग्रह 166
 
रचना :
महाराजा सवाई प्रतापसिंह जी अच्छे कवि थे, अपने पदों में ब्रजनिधि की छाप लगाते थे, अतः बहुत से उन्हें ब्रजनिधि भी कहते थे, मिश्रबन्धुओं ने इनकी रचनाओं में - 1. शृङ्गार-मञ्जरी, 2. नीति-मंजरी, 3. वैराग्य मंजरी आदि का उल्लेख किया है, और रचनाकाल 1778 माना है । स्नेह संग्राम, संचसागर, रेखता और भर्तृहरि शतक की टीका इनका रचना-काल 1795 माना है । इनकी रचनाओं का संग्रह "ब्रजनिधि ग्रंथावलि" के नाम से नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ने प्रकाशित करवाया है ।
महाराजा सवाई प्रतापसिंह जी के काव्य के अंतर्गत विद्यमान वर्ण्यविमायों में नीति, वैराग्य, उपदेश, श्रृंगार, संयोग, विरह, प्रेम एवं उपासना के साथ-साथ रासलीलादि का भी चित्रण अत्यन्त उत्कृष्ट रूप में अंकित किया गया है । श्री राधामाधव के प्रति अनन्यता, दीनता एवं प्रीति को प्रकट करते हुए, ब्रजनिधि जी ने रासलीलान्तर्गत वंशीवादन से लेकर नृत्य, अभिनय एवं रति-रमणोत्सव का भी सांगोपांग निरूपण किया है । इनकी रचनाओं के अन्तर्गत ब्रजभाषा के प्रयोग में राजस्थानी, पंजाबी, संस्कृत, उर्दू, फारसी तथा खड़ी बोली के शब्दों का भी समावेश दृष्टिगोचर होता है । रचनाओं में इन भाषाओं के शब्दों के प्रयोग से, जहां एक ओर, ब्रजभाषा में प्रसाद-गुण झलकता है, वहीं दूसरी ओर ब्रजभाषा का माधुर्य भी बराबर स्थिर रहता है ।
 
इस प्रकार, ब्रजनिधि जी रासलीला के अनुकरण सम्बन्धी उत्सवों को तो सहायता एवं प्रोत्साहन देते ही थे, साथ ही रासलीला विषयक पद इत्यादि की भी रचनायें अत्यंत मनोयोग एवं भक्ति पूर्वक करते थे । श्री राधाकृष्ण युगल अनन्य भक्ति होने से, इनकी रासलीलाभिव्यंजना मी पारम्परिक एवं आह्लाद कारक है ।
 
हम तो चाकर नन्दकिशोर के।
रहें सदा सनमुख रख लीए गौरी गरब गरुर के ॥
- ब्रजनिधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि मुक्तावली, पद-19
 
अपने रासलीला-निरूपण में भी, श्री ब्रजनिधि जी में प्रथमतः वंशीवादन की ही प्रतिष्ठा आ जाती है । यहाँ भी श्रीकृष्ण की वंशी ऐसे मधुर प्रेम के स्वरों का प्रसारण करती है, कि श्रीकृष्ण मिलन की उत्कण्ठा से ब्रजदेवियाँ अधीर बन जाती हैं और वे चल ही देती है ।
 
मोहन मदन मन्त्र पढ़ि डार्यो ।
घर में रह्यो जात नहि सजनी वंसी में लै नाम उचार्यो ॥
- ब्रजनिधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि मुक्तावली, पद 71
 
सचमुच श्रीकृष्ण की इस वंशी ध्वनि ने ऐसी मोहिनी डाली थी कि सभी ब्रजदेवियां थकित, चकित तथा वशीभूत हो गई थीं । परिणामतः वंशी के मधुर स्वर के साथ उनके द्वारा वादित विविध वाद्यों की ध्वनियाँ तथा नूपुरादि की झंकृतियों ने भी, वृन्दावन के रासोत्सव में, एक अभूत पूर्व संगीत वाद की सृष्टि की थी ।
 
राजत बंसी मधुर धुनि मन मोहन की आन ।
सुनत थकित चकृत रही अद्भुत अति ही तान ॥
- ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रेमप्रकास, संख्या-36
 
'रास का रेखता' - नामक अपनी रचना में तो श्री ब्रजनिधि जी ने रासलीला का निरूपण किया ही है, साथ ही अन्य कई रचनाओं में भी रासलीला को वर्ण्य विषय बनाया है । मण्डलाकार रास के मध्य ललिता द्वारा ताथैई-थैई का मधुर उच्चारण, श्रीयुगल का रससिक्त अवलोकन, नेत्र-संकेत, स्वरूपैक्य, वाद्य वादन, मुरलीध्वनि, नृत्य एवं भगवान शिव का सखी रूप से रासलीला में प्रवेश तथा नृत्य आदि शरद्चन्द्रिका में एक अभूतपूर्व रस की सृष्टि कर देते हैं ।
 
ललिता दियो उघटती तार्थई थेई थेइ ।
रास - मण्डल बीच झेहें पीय प्यारी ॥
- ब्रजनिधि ग्रंथावली, रास का रेखता
 
इस दिव्य रासलीला में नटनागर श्री कृष्ण तो अपना नित्य नूतन कौशल प्रदर्शित करते ही हैं, साथ ही वहां का वातावरण, ब्रजांगनायें, चेष्टाएँ, साज-सज्जाएँ, गीत-गायन, लीला- विलास, वाद्य-ध्वनियाँ, विनोद, प्रेमवार्ताएं तथा हाव-भाव कटाक्ष आदि भी नित्य नवीन रूप में दृष्टिगोचर होते हैं ।
 
फुलवन सों झुकि रही लता महिं ठाढ़े जहां कुंवर नटनागर ।
नवल लाल नव बाल भाल गल बसन नये भूषनहि उजागर ॥
- ब्रजनिधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि मुक्तावली, पद- 61
 
सखियों सहित श्रीयुगल के कुंज- रासलीला नृत्य का भी जो वर्णन श्री ब्रजनिधि जी ने किया है, वह भी संगीत एवं रस के उत्कर्ष का द्योतक है । 
 
विहरत राधे संग विहारी ।
कुंज भवन सीतल द्रुम-छैयां चंद-ज्योति उजियारी ॥
- ब्रजनिधि ग्रंथावली, ब्रजनिधि मुक्तावली, पद-31
 
इस रास लीला नृत्य में परस्पर गीत गायन, नृत्य, वाद्य वादन एवं श्रीप्रिया जी का कौशल इतने असाधारण रूप में प्रदर्शित होता है कि रासेश्वर कृष्ण बेसुध तक हो जाते हैं ।
 
नवल विहारी नवल तिय जोरी परम प्रवीन ।
गान दोऊ करि परस पर, भए अधिक अधीन ॥
- ब्रजनिधि ग्रंथावली, ब्रजश्रृंगार, दोहा-36, 37, 38, 39
 
इस प्रकार प्रिया जी श्री कृष्ण को अपने कौशल से बेसुध भी कर देती हैं और विह्वल भी ।
 
प्रेम में छके हैं दोऊ रस की चुहल बढ़ै,
गान कियो आनि पिय प्यारी अति आन सों ।
- ब्रजनिधि ग्रंथावली, ब्रज श्रृंगार, कवित्त - 40
 
रासलीला के परमोत्कर्ष रूप रति-रमणोत्सव का भी चित्रण, श्री ब्रजनिधि जी ने अत्यन्त माधुर्यपूर्ण ढंग से किया है । इनके इस निरूपण में रासलीला-नृत्य के साथ रति-रमणोत्सव रूपी रासलीला के दो ही रूप अत्यन्त सांगोपांग रूप में परि लक्षित हैं ।
 
लीला संवरण :
इस प्रकार राज्य की रक्षा करते हुए तथा अपने परम इष्ट श्री गोविंदेवजी के चरणों में अटल भक्ति रखते हुए महाराज सवाई प्रतापसिंह जी अब उस समय के निकट आ पहुँचे जब अगणित चिंताओं से उनका मन खिन्न हो गया और उनके शरीर में रुधिर विकार और फिर अतिसार रोग की प्रबलता हो गई । इस अवस्था में ये प्रायः ठाकुर श्री ब्रजनिधिजी के चरणों के तले तहखाने में आराम किया करते । इनके समय में बड़े बड़े नामी वैद्य थे, जिन्होंने औषधि-प्रयोग के द्वारा जल से भरे हौज तक को जमा दिया था । परंतु उनकी वे औषधियाँ भी इस अतिसार को रोकने में असमर्थ रहीं । अंततोगत्वा इनकी पवित्र आत्मा ने, गोलोक - वास करने के लिये, इनके नश्वर शरीर को मिती सावन सुदी 13 1803 को त्याग दिया । ढूँढाहड़ के एक नामी, पराक्रमी, ज्ञानी-ध्यानी, विद्वान और विद्या- कला रसिक, गुणियों और कवियों के ग्राहक राजा इस संसार से उठ गए! परंतु अपनी अटल कीर्त्ति को जो उनके अलौकिक कार्यों, साहित्य-सेवा, गुण-ग्राहकता और भगवत्-प्रेम के कारण प्रतिष्ठित थी  - इस जगत् में छोड़ गए । महाराज का दाहकर्म 'गेटोर' में हुआ, जहाँ इनके पूर्वजों ( पिता और पितामह ) की समाधियाँ हैं । वहीं सफेद पत्थर की सुंदर छतरी इनकी स्मृति रक्षा के निमित्त बनी हुई है । इनके पीछे इनके महाराजकुमार जगतसिंहजी गद्दी पर विराजमान हुए ।