(राग कान्हरा)
जो पै श्री राधा रूप न धरतीं ।
प्रेम-पंथ जग प्रकट न हो तो ब्रज - बनिता कहा करतीं ॥ [1]
पुष्टिमार्ग थापित को करतो ब्रज रहतो सब सूनो ।
हरि लीला काके संग करते मंडल होते ऊनो ॥ [2]
रास मध्य को रमतो हरि संग रसिक सुकवि कह गाते ।
'हरीचन्द' भव के भय सों भजि किहि के सरनहिं जाते ॥ [3]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, राग संग्रह (37)
यदि श्री राधा ब्रज-धाम में प्रकट नहीं होतीं तो जग में प्रेम-पंथ का प्राकट्य नहीं होता, ब्रजांगनाएं तब क्या करतीं ? [1]
तब कौन पुष्टिमार्ग की स्थापना करता, समस्त ब्रज-मंडल सूना हो जाता । श्री कृष्ण किसके संग मधुर लीलाएं करते, सखियों का मंडल हीन हो जाता । [2]
रास मध्य तब कौन श्री कृष्ण के संग रस बरसाता? रसिक कवि किसको [श्री राधा के अतिरिक्त] अपनी वाणीयों में उन्मत्त होकर गाते?
श्री हरिश्चंद्र जी कहते हैं कि यदि श्री राधा ही न होती तो हम भव-सागर से भयभीत होकर किसकी शरण ग्रहण करते ? [3]
जो पै श्री राधा रूप न धरतीं ।
प्रेम-पंथ जग प्रकट न हो तो ब्रज - बनिता कहा करतीं ॥ [1]
पुष्टिमार्ग थापित को करतो ब्रज रहतो सब सूनो ।
हरि लीला काके संग करते मंडल होते ऊनो ॥ [2]
रास मध्य को रमतो हरि संग रसिक सुकवि कह गाते ।
'हरीचन्द' भव के भय सों भजि किहि के सरनहिं जाते ॥ [3]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, राग संग्रह (37)
यदि श्री राधा ब्रज-धाम में प्रकट नहीं होतीं तो जग में प्रेम-पंथ का प्राकट्य नहीं होता, ब्रजांगनाएं तब क्या करतीं ? [1]
तब कौन पुष्टिमार्ग की स्थापना करता, समस्त ब्रज-मंडल सूना हो जाता । श्री कृष्ण किसके संग मधुर लीलाएं करते, सखियों का मंडल हीन हो जाता । [2]
रास मध्य तब कौन श्री कृष्ण के संग रस बरसाता? रसिक कवि किसको [श्री राधा के अतिरिक्त] अपनी वाणीयों में उन्मत्त होकर गाते?
श्री हरिश्चंद्र जी कहते हैं कि यदि श्री राधा ही न होती तो हम भव-सागर से भयभीत होकर किसकी शरण ग्रहण करते ? [3]

