ऐसी पीर हिये में व्यापै ।
नयना सजल नाम रट लागै, अंग-अंग अति काँपै ॥ [1]
कोऊ दृग देख्यौ न सुहावै, अति दुख नैंनन ढाँपै।
'भोरी' लै-लै नाम रावरौ, ऊँचे टेर अलापै ॥ [2]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (310)
हे श्री राधा, मेरे ह्रदय में आपके विरह की ऐसी पीड़ा हो कि मेरे नेत्रों से अविरल अश्रुधार प्रवाहित होने लगे, मैं नित्य आपका नाम रटने लगूँ और मेरा अंग-अंग काँपने लगे । [1]
मुझे आपके अतिरिक्त किसी को भी देखना कष्टकारी लगने लगे तथा मेरी आँखें अत्यन्त दुःख से बन्द होने लगें । श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि मैं आपको सुनाने के लिये अत्यन्त उच्च स्वर से आपका नाम ले-लेकर आपको पुकारने लगूँ । [2]
नयना सजल नाम रट लागै, अंग-अंग अति काँपै ॥ [1]
कोऊ दृग देख्यौ न सुहावै, अति दुख नैंनन ढाँपै।
'भोरी' लै-लै नाम रावरौ, ऊँचे टेर अलापै ॥ [2]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (310)
हे श्री राधा, मेरे ह्रदय में आपके विरह की ऐसी पीड़ा हो कि मेरे नेत्रों से अविरल अश्रुधार प्रवाहित होने लगे, मैं नित्य आपका नाम रटने लगूँ और मेरा अंग-अंग काँपने लगे । [1]
मुझे आपके अतिरिक्त किसी को भी देखना कष्टकारी लगने लगे तथा मेरी आँखें अत्यन्त दुःख से बन्द होने लगें । श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि मैं आपको सुनाने के लिये अत्यन्त उच्च स्वर से आपका नाम ले-लेकर आपको पुकारने लगूँ । [2]

