जे जे राधा नाम को भजत जगत में जान ।
ते ते सब हमरे सदा हैंगे प्रान समान ॥ [1]
तिन को दासंतन सदा मेरे मन बच आहि ।
तिनकी तो हों कहा कहौं जे कुँवरि चरन अबगांहि ॥ [2]
श्रीगुरु ललिता रूप मम तिनको नाम रटन्त ।
पाऊ सम्पति राधिका वृन्दाबिपिन बसन्त ॥ [3]
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (20)
जो जो इस जगत में नित्य श्री राधा नाम का भजन करते हैं वह सब मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं । [1]
मैं मन एवं वचनों से ऐसे रसिक संतों का सदा दास हूँ । ऐसे अनन्य रसिकों के बारे में मैं क्या कहूँ जो श्री राधा की अनन्य शरण में हैं । [2]
मेरे लिए वे रसिक संत भी मेरी गुरु श्री ललिता जी के ही अन्य रूप हैं, उनका नाम मैं रटता हूँ जिसके फल स्वरूप श्री वृंदावन की दिव्य सम्पति श्री राधिका को मैं पाता हूँ । [3]
ते ते सब हमरे सदा हैंगे प्रान समान ॥ [1]
तिन को दासंतन सदा मेरे मन बच आहि ।
तिनकी तो हों कहा कहौं जे कुँवरि चरन अबगांहि ॥ [2]
श्रीगुरु ललिता रूप मम तिनको नाम रटन्त ।
पाऊ सम्पति राधिका वृन्दाबिपिन बसन्त ॥ [3]
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (20)
जो जो इस जगत में नित्य श्री राधा नाम का भजन करते हैं वह सब मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं । [1]
मैं मन एवं वचनों से ऐसे रसिक संतों का सदा दास हूँ । ऐसे अनन्य रसिकों के बारे में मैं क्या कहूँ जो श्री राधा की अनन्य शरण में हैं । [2]
मेरे लिए वे रसिक संत भी मेरी गुरु श्री ललिता जी के ही अन्य रूप हैं, उनका नाम मैं रटता हूँ जिसके फल स्वरूप श्री वृंदावन की दिव्य सम्पति श्री राधिका को मैं पाता हूँ । [3]

