आवत है मन ऐसी मेरें, सगरी लाज गमाऊँ - गोस्वामी श्री हरिराय जी

आवत है मन ऐसी मेरें, सगरी लाज गमाऊँ - गोस्वामी श्री हरिराय जी

आवत है मन ऐसी मेरें, सगरी लाज गमाऊँ ।
‘रसिक प्रीतम' सों प्रीति जोरी, सो सखी कहाँ लौं दुराउँ ॥

- गोस्वामी श्री हरिराय जी

मेरे मन में अब ऐसा विचार आता है कि मैं लोक-लाज की सारी मर्यादाओं को पूरी तरह त्याग दूँ क्योंकि प्रियतम श्री श्यामसुंदर से जो प्रेम का नाता जोड़ा है, उसे हे सखी! मैं अब और कहाँ तक और कब तक छिपाकर रखूँ?