रस को रसिक स्वादी जानैं - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (707)

रस को रसिक स्वादी जानैं - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (707)

रस को रसिक स्वादी जानैं ।
अनन्य नृपति हरिदासी संग बिन दुर्लभ नेह निधानैं ॥ [1]
कुंज महल नित अंग-अंग क्रीडत ताहि कौंन पहिचानैं ।
रसिक रूप सुख लहै चहै जो बिपुल बिहार निदानैं ॥ [2]

- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (707)

रस का स्वाद तो रसिक ही जानता है । अनन्य नृपती ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी के संग के बिना श्री प्रिया प्रियतम के इस दुर्लभ प्रेम को कोई कैसे प्राप्त कर सकता है ? [1]

कुंज महल में प्रिया प्रियतम नित्य अंग से अंग लगाकर क्रीड़ा के रस को कोई कैसे पहचान सकता है ? श्री रूप सखी जी कहते हैं कि वृंदावन के इस अखंड नित्य विहार रूपी अंतिम रस को स्वामी हरिदास जी की कृपा से ही कोई पा सकता है । [2]