मुक्त भये मुनि जन कहैं होय दुखन कौ अन्त - ब्रज के दोहे

मुक्त भये मुनि जन कहैं होय दुखन कौ अन्त - ब्रज के दोहे

मुक्त भये मुनि जन कहैं, होय दुखन कौ अन्त।
पै पुनि कहाँ राधा दरस, कहाँ मिलैं पुनि सन्त॥

- ब्रज के दोहे

जीव की जब मुक्ति होती है, तो उसके दुखों का अंत हो जाता है, परंतु वह श्री राधा-दर्शन एवं संत-समागम से सदा के लिए वंचित हो जाता है। भाव यह है कि जीव को भक्ति माँगनी चाहिए, मुक्ति नहीं।