(राग धनाश्री व सारंग)
जो जन हिरदै नाम धरै ।
अष्ट सिद्धि नव निधि को बपुरी लटकत लारि फिरै ॥ [1]
ब्रह्मलोक इंद्र लोक सिवलोक सबहू तै ऊपरै ।
जो न पत्याऊं तौ चितवौ ध्रुव तन टारयौ हू न टरै ॥ [2]
सुंदर स्याम कमल दल लोचन सब दुख दूरि करै ।
'परमानंददास' कौ ठाकुर वाचा ते न टरै ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1359)
जिनके ह्रदय में भगवान् का नाम नित्य विराजमान है उनके पीछे बेचारी अष्ट-सिद्धि और नवों निधि मुख से लार टपकाते हुए फिरती हैं । [1]
उनका लोक ब्रह्मलोक, शिवलोक और इन्द्रलोक से भी ऊपर है, यदि विश्वास न हो तो भक्त ध्रुव को देख लो, मृत्यु भी जिनका कुछ न बिगाड़ पायी । [2]
श्री परमानन्द दास जी कहते हैं कि मेरे ठाकुर कमल-दल लोचन श्यामसुंदर श्री कृष्ण अपने भक्तों के सब दुःखों को दूर करते हैं, यह उनकी प्रतिज्ञा है, जिसे वे कभी नहीं तोड़ते । [3]
जो जन हिरदै नाम धरै ।
अष्ट सिद्धि नव निधि को बपुरी लटकत लारि फिरै ॥ [1]
ब्रह्मलोक इंद्र लोक सिवलोक सबहू तै ऊपरै ।
जो न पत्याऊं तौ चितवौ ध्रुव तन टारयौ हू न टरै ॥ [2]
सुंदर स्याम कमल दल लोचन सब दुख दूरि करै ।
'परमानंददास' कौ ठाकुर वाचा ते न टरै ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1359)
जिनके ह्रदय में भगवान् का नाम नित्य विराजमान है उनके पीछे बेचारी अष्ट-सिद्धि और नवों निधि मुख से लार टपकाते हुए फिरती हैं । [1]
उनका लोक ब्रह्मलोक, शिवलोक और इन्द्रलोक से भी ऊपर है, यदि विश्वास न हो तो भक्त ध्रुव को देख लो, मृत्यु भी जिनका कुछ न बिगाड़ पायी । [2]
श्री परमानन्द दास जी कहते हैं कि मेरे ठाकुर कमल-दल लोचन श्यामसुंदर श्री कृष्ण अपने भक्तों के सब दुःखों को दूर करते हैं, यह उनकी प्रतिज्ञा है, जिसे वे कभी नहीं तोड़ते । [3]

