वेषधारी हरि के उर सालै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रन्थ (पूर्वार्ध) (4)

वेषधारी हरि के उर सालै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रन्थ (पूर्वार्ध) (4)

वेषधारी हरि के उर सालै ।
लोभी, दंभी कपटी नट से, सिस्नोदर कौं पालै ॥ [1]
गुरू भयौ घर घर में डोलै, नाम धनी कौ बेचै ।
परमारथ सपने नहिं जानै, पैसन ही को खैचै ॥ [2]
कबहुंक वक्ता ह्वै बनि बैठै, कथा भागवत गावै ।
अर्थ अनर्थ कछू नहिं भासै, पैसनि ही कौं धावै ॥ [3]
कबहुँक हरिमंदिर कौं सेवै, करै निरंतर बासा ।
भाव भक्ति कौ लेस न जानै, पैसन ही की आसा ॥ [4]
नाचै, गावै चित्र बनावै, करै काव्य चटकीली ।
सांच बिना हरि हाथ न आवै, सब रहनी है ढीली ॥ [5]
बिन बिबेक बैराग, भक्ति बिनु, सत्य न एकौ मानौ ।
‘भगवत’ बिमुख कपट चतुराई, सो पाखंडै जानौ ॥ [6]

- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रन्थ (पूर्वार्ध) (4)

श्रीहरि के भक्तों का वेश बनाकर भी जो व्यक्ति (खेल तमाशा दिखाने वाले) नट की तरह लोभ, पाखण्ड और कपट के सहारे इंद्रिय सुखों की प्राप्ति और उदर पूर्ति में लगे रहते हैं, वे हमारे हृदय को (अथवा श्रीहरि के हृदय को ) बहुत चोट पहुँचाते हैं । [1]

ऐसे लोग अपने आप को सिद्ध गुरु बताते हुए घर घर में डोलते हैं और अपने स्वामी (इष्ट) के नाम को धनी लोगों को बेचते हैं । ये लोग जीवन के चरम प्रयोजन (श्रीहरि की भक्ति ) को तो सपने में भी नहीं पहचानते, सिर्फ धन बटोरने में लगे रहते हैं । [2]

कभी ये कथावाचक के रूप में खूब सज धज कर बैठते हैं । तथा श्रीमद भागवतजी की कथा गाते है। उस समय भी इनके मन को अर्थ अनर्थ का कुछ भी भान नहीं होता ओर ये केवल पैसों के लिए दौड लगाते रहते हैं । [3]

कभी ये श्रीहरि के मंदिर का सहारा लेकर ( पुजारी बनकर ) वहाँ निरंतर निवास करते हैं, किन्तु वहाँ (श्रीहरि के सानिध्य में) भी इन्हें भक्ति भाव से रत्ती भर भी परिचय नहीं होता और ये सदा पैसों की ही आशा लगाये रहते हैं । [4]

ये लोग कभी नाचते हैं, कभी गाते हैं और कभी चित्र बनाते हैं तथा कभी चटकदार कविता गाते हैं, किन्तु ( हर काम में पैसों पर नजर होने के कारण) सच्चाई के अभाव में श्री हरि इन लोगों की पकड़ में कभी नहीं आते । [5]

बिना विवेक और वैराग्य के, बिना भक्ति के, इनके किसी भी व्यव्हार को सच्चा नहीं मानना चाहिए । श्री भगवतरसिक जी कहते हैं कि भगवान् से विमुख रखने वाली समस्त कपटपूर्ण चालाकियों को पाखंड ही समझना चाहिये । [6]