सदा गायं-गायं मधुरतर राधा-प्रिय यशः - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (253)

सदा गायं-गायं मधुरतर राधा-प्रिय यशः - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (253)

सदा गायं-गायं मधुरतर राधा-प्रिय यशः, सदा सान्द्रानन्दा नव रसद राधापति-कथाः।
सदा स्थायं-स्थायं नव निभृत राधा-रति-वने, सदा ध्यायं-ध्यायं विवश हृदि राधा-पद-सुधाः॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (253)

मैं श्रीराधा के नव-निभृत केलि कुञ्ज कानन में स्थित रहती हुई, सदा मधुरतर श्रीराधा के प्रिय यशों का तथा घनीभूत नव-नव आनन्द-रस-दायी श्रीराधापति की कथाओं का बारम्बार गान करती हुई एवं श्रीराधा-पद-सुधा का सर्वदा ध्यान करती हुई कब विवश हृदय होऊंगी ?