कमल से कोमल ओ चीकने जू माखन ते,
परे दृष्टि कृपामयी होत प्रेम वृष्टि है। [1]
तिहारे चरण अरविन्द जू निहारे राधे,
विमल अनूप लखी रसमयी सृष्टि है॥ [2]
मोहन मन मोहिवे की गति हूँ भूल जात,
ऐसो प्रभाव लखि वारो रति कोटि है। [3]
सेवत चरन सेवा कुञ्ज में अनोखी भाँति,
'प्रियादासी' निरखत लतान द्रुम ओट है॥ [4]
- श्री प्रियादासी जी
हे श्री राधा, आपके चरण कमल पुष्प के समान कोमल हैं और माखन की भाँति चिकने हैं, जिन पर दृष्टि पड़ने से ही हृदय में प्रेम की वर्षा होने लगती है। [1]
आपके विमल और अनुपम चरण कमलों को निहारने पर श्री कृष्ण रसमयी सृष्टि में डूबने लगे हैं। [2]
मनमोहन श्री कृष्ण, मन को मोहने की कला भी भूल जाते हैं, श्री राधा के चरण कमलों के ऐसे प्रभाव को देखकर वे कोटि-कोटि रतियों को न्योंछावर करने लगते हैं। [3]
श्री प्रियादासी जी कहतीं हैं कि सेवा कुञ्ज में श्री कृष्ण श्री राधा के चरणों की सेवा अनोखी भाँति से कर रहे हैं, जिसका मैं लताओं की ओट से दर्शन कर रही हूँ। [4]
परे दृष्टि कृपामयी होत प्रेम वृष्टि है। [1]
तिहारे चरण अरविन्द जू निहारे राधे,
विमल अनूप लखी रसमयी सृष्टि है॥ [2]
मोहन मन मोहिवे की गति हूँ भूल जात,
ऐसो प्रभाव लखि वारो रति कोटि है। [3]
सेवत चरन सेवा कुञ्ज में अनोखी भाँति,
'प्रियादासी' निरखत लतान द्रुम ओट है॥ [4]
- श्री प्रियादासी जी
हे श्री राधा, आपके चरण कमल पुष्प के समान कोमल हैं और माखन की भाँति चिकने हैं, जिन पर दृष्टि पड़ने से ही हृदय में प्रेम की वर्षा होने लगती है। [1]
आपके विमल और अनुपम चरण कमलों को निहारने पर श्री कृष्ण रसमयी सृष्टि में डूबने लगे हैं। [2]
मनमोहन श्री कृष्ण, मन को मोहने की कला भी भूल जाते हैं, श्री राधा के चरण कमलों के ऐसे प्रभाव को देखकर वे कोटि-कोटि रतियों को न्योंछावर करने लगते हैं। [3]
श्री प्रियादासी जी कहतीं हैं कि सेवा कुञ्ज में श्री कृष्ण श्री राधा के चरणों की सेवा अनोखी भाँति से कर रहे हैं, जिसका मैं लताओं की ओट से दर्शन कर रही हूँ। [4]

