कूकर ह्वै बन-बीथिन डोलौं, बचे सीथ रसिकन के खाऊँ ।
'ललितकिसोरी' आस यही मम, ब्रज-रज तजि छिन अनत न जाऊँ ॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (65)
मुझे ब्रज की कुञ्ज गलियों में घूमने वाला और ब्रजवासियों के जूठन को खाने वाला कुत्ता बनना स्वीकार है लेकिन ब्रज-रज का संग एक क्षण के लिए भी छोडना स्वीकार नहीं है, यही मेरी कामना है ।
'ललितकिसोरी' आस यही मम, ब्रज-रज तजि छिन अनत न जाऊँ ॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (65)
मुझे ब्रज की कुञ्ज गलियों में घूमने वाला और ब्रजवासियों के जूठन को खाने वाला कुत्ता बनना स्वीकार है लेकिन ब्रज-रज का संग एक क्षण के लिए भी छोडना स्वीकार नहीं है, यही मेरी कामना है ।

