जनम तेरा बातों ही बीत गयो - श्री कबीरदास

जनम तेरा बातों ही बीत गयो - श्री कबीरदास

जनम तेरा बातों ही बीत गयो तुने कबहू न कृष्ण कह्यौ ।
पाँच बरस का भोला भाला अब तो बीस भयो ।
मकर पच्चीसी माया कारन, देश विदेश गयो ॥ [1]
तीस बरस की अब मति उपजी, लोभ बढ़े नित नयो ।
माया जोरी लाख करोरी, अजहूं न तृप्त भयो ॥ [2]
वृद्ध भयो तब आलस उपज्यो, कफ नित कंठ नयो ।
साधू संगति कबहू न किन्हीं , बिरथा जन्म गयो ॥ [3]
यह जग सब मतलब का लोभी, झूठो ठाठ रचयौ ।
कहत ‘कबीर’ समझ मन मूरख, तूं क्यूँ भूल गयो ॥ [4]

- श्री कबीरदास

श्री कबीरदास अपने मन से कहते हैं कि हे मन, तेरा जनम बातों में ही बीता जा रहा है, तूने कभी कृष्ण नाम नहीं लिया ?
तू पाँच वर्ष का भोला भाला था । उसके बाद तू जब बीस वर्ष का हुआ तब तूने मकर पचीसी (पँच महाभूत ,पँच कर्मेन्द्रियाँ, पँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय, त्रिगुण [रजोगुण,तमोगुण ,सतोगुण], अहंकार, मन) में लिप्त होकर देश विदेश के चक्कर काटे । [1]

जब तू तीस वर्ष का हो गया तब तेरा नित्य नया नया लोभ जगा और तूने लाख, करोड़ रुपया (माया) जोड़ना शुरू किया जिससे तू आज तक नहीं तृप्त हो सका । [2]

जब तू वृद्ध हो गया फिर तुझे आलस ने घेर लिया और तेरे कंठ में नित्य कफ होने लगा । तूने जीवन में कभी भी संतों का संग नहीं किया; तेरा जनम वृथा (बर्बाद) हो गया । [3]

यह संसार तो मतलब का है (स्वार्थी) है जो ऊपर से नीचे तक बनावटी (झूठा) है । श्री कबीरदास जी कहते हैं कि हे मूर्ख मन, तू इस स्वार्थी संसार को ठीक से समझ जा, तू यह सब कुछ देखते हुए भी क्यूँ भूल गया ? [4]