परम दयाल दूजी आपसी न दीसै और,
ऐहो सिरमौर पदपद्म में सिरनाऊँ मैं। [1]
लाड़ली लला की मनभावनी रिझावनी हौ,
गुनन अथाह सिन्धु थाह किमि पाऊँ मैं॥ [2]
अति मतिहीन दीन बावरी हौं स्वामिनि जू,
एहौ कृष्ण अली चेरी रावरी कहाऊँ मैं। [3]
श्रीवन निकुंजन में दीजिये निवास सदा,
'लाल बलबीर' राधा राधा गुन गाऊँ मैं॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, महल वर्णन (8)
हे श्री राधा, आप परम दयालु हैं और आपके जैसा मुझे कोई और दिखाई नहीं देता। हे सिरमौर, मैं आपके चरण कमलों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ। [1]
हे लाड़ली, आप श्री लाल जी की अत्यन्त मनभावनी और रिझावनी हो। आपके गुण सागर के समान अथाह हैं, जिसका थाह पाना मेरे लिए असंभव है। [2]
हे स्वामिनी जी, मैं मतिहीन हूँ, दीन हूँ, बावरी हूँ, लेकिन श्री कृष्ण की चेरी हूँ, इसलिए आपकी हूँ। [3]
श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि हे श्री राधा, मुझे श्री वृन्दावन के निकुंजों में सदा के लिए निवास प्रदान कीजिये, जहाँ मैं नित्य अनन्य भाव से श्री राधा राधा ही गुणगान करूँगा। [4]
ऐहो सिरमौर पदपद्म में सिरनाऊँ मैं। [1]
लाड़ली लला की मनभावनी रिझावनी हौ,
गुनन अथाह सिन्धु थाह किमि पाऊँ मैं॥ [2]
अति मतिहीन दीन बावरी हौं स्वामिनि जू,
एहौ कृष्ण अली चेरी रावरी कहाऊँ मैं। [3]
श्रीवन निकुंजन में दीजिये निवास सदा,
'लाल बलबीर' राधा राधा गुन गाऊँ मैं॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, महल वर्णन (8)
हे श्री राधा, आप परम दयालु हैं और आपके जैसा मुझे कोई और दिखाई नहीं देता। हे सिरमौर, मैं आपके चरण कमलों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ। [1]
हे लाड़ली, आप श्री लाल जी की अत्यन्त मनभावनी और रिझावनी हो। आपके गुण सागर के समान अथाह हैं, जिसका थाह पाना मेरे लिए असंभव है। [2]
हे स्वामिनी जी, मैं मतिहीन हूँ, दीन हूँ, बावरी हूँ, लेकिन श्री कृष्ण की चेरी हूँ, इसलिए आपकी हूँ। [3]
श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि हे श्री राधा, मुझे श्री वृन्दावन के निकुंजों में सदा के लिए निवास प्रदान कीजिये, जहाँ मैं नित्य अनन्य भाव से श्री राधा राधा ही गुणगान करूँगा। [4]

