राग मुक्त मन शुद्ध ह्वै, विगत ज्ञान अज्ञान।
प्रेमी के सुख में सुखी, यह स्वभाव अब आन॥
- ब्रज के दोहे
जब मन समस्त राग-द्वेष और आसक्तियों से मुक्त होकर पूर्णतः शुद्ध हो जाता है, तब ज्ञान और अज्ञान के द्वंद्व स्वतः समाप्त हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में साधक का केवल एक ही स्वभाव शेष रह जाता है—अपने प्रेमास्पद (श्री राधा-कृष्ण) के सुख में ही परम सुखी होना।
प्रेमी के सुख में सुखी, यह स्वभाव अब आन॥
- ब्रज के दोहे
जब मन समस्त राग-द्वेष और आसक्तियों से मुक्त होकर पूर्णतः शुद्ध हो जाता है, तब ज्ञान और अज्ञान के द्वंद्व स्वतः समाप्त हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में साधक का केवल एक ही स्वभाव शेष रह जाता है—अपने प्रेमास्पद (श्री राधा-कृष्ण) के सुख में ही परम सुखी होना।

