कब बइकुण्ठ माहिं गायन चराय आए - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (100)

कब बइकुण्ठ माहिं गायन चराय आए - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (100)

(कवित्त)
कब बइकुण्ठ माहिं गायन चराय आए,
कौंन रिझवारि उहाँ बँधी प्रेम पास तैं। [1]
कब बइकुण्ठ माहिं मोहनी बजी है बैंन,
प्यारिन कैं हेत रास रंग के विलास तैं॥ [2]
कब बैकुण्ठ माहिं केलि कीनी इहाँ जैसी,
कहूँ कैसी - कैसी जिय नागर हुलास तैं। [3]
व्रज ही समंधी रूप लीला सब जग गाई,
पाई परमेसुर हूँ शोभा व्रज बास तैं॥ [4]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (100)

श्री हरि ने बैकुण्ठ धाम में कब गाय चराई है, और वहाँ कौन सी गोपी उनके प्रेम के पाश बंधी है? [1]

श्री हरि ने बैकुण्ठ धाम में ब्रज के समान कब केलि-लीला की, जिससे हृदय में हुलास बढ़ता हो? [2]

श्री हरि ने बैकुण्ठ धाम में ब्रज के समान कब केलि-क्रीड़ा की जिससे हृदय में हुलास बढ़ता हो ? [3]

श्री नागरीदास जी कहते हैं कि समस्त भक्तों ने ब्रज से संबंधित ही मधुर लीला का गान किया है। परमेश्वर श्री कृष्ण ने भी ब्रजवास से ही शोभा पाई है। [4]