प्यारी तौपै कितौक संग्रह छबिन कौ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (66)

प्यारी तौपै कितौक संग्रह छबिन कौ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (66)

(राग सारंग)
प्यारी तौपै कितौक संग्रह छबिन कौ
अंग अंग प्रति नाना भाइ दिखावति । [1]
हाथ किन्नरी मध्य सचु पाँइ सुलप
राग रागिनी सौं तू मिलि गावति ॥ [2]
कहा कहौं एक जीभ गुन अगनित
हारि परयौ कछु कहत न आवति । [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम कहत री प्यारी
तू जे जे भाई ल्यावति ॥ [4]

- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (66)

कुंज महल में श्री लाल जू प्रिया जी के चरणों से लिपटे हैं ।
श्री लाल जी [कृष्ण], श्री राधा से कहते हैं: हे प्यारी जू, तुम्हारे पास छबि के कितने संग्रह हैं ? तुम्हारे अंगों से विभिन्न केलि के प्रकाश उत्पन्न होते हैं । [1]

आपके हाथों से विभिन्न प्रकार के संगीत वाद्य [बाजे] की मधुर ध्वनि जिसके माध्यम से आनंद रस बरसता है, जिसके संग सुलप नृत्य, एवं आप राग और रागिनी के सामंजस्य में गान करती हैं। [2]

हे प्यारी जू, आपके अनंत गुणों को मैं एक जिह्वा से कैसे बखान करूँ । मैं तो हार ही गया हूँ और कुछ भी कहने में असमर्थ हूँ । [3] 

श्री हरिदास जी के श्यामसुंदर श्री श्यामा प्यारी से कहते हैं कि आप जो जो भी भाव लाती हैं,  मैं उसी के अनुरूप ही अपने को रखता हूँ । [4]