वृन्दावन धाम अपार जपे जा राधे राधे - श्री अली माधुरी जी

वृन्दावन धाम अपार जपे जा राधे राधे - श्री अली माधुरी जी

वृन्दावन धाम अपार जपे जा राधे राधे ।
जपे जा राधे राधे भजे जा राधे राधे॥ [1]
जो राधा राधा गावे सो प्रेम पदारथ पावे ।
बाको बेड़ा हो जाय पार जपे जा राधे राधे ॥ [2]
जो राधानाम न हो तो, रस राज विचारो रोतो ।
नहीं हो तो कृष्ण अवतार जपे जा राधे राधे ॥ [3]
या वृन्दावन की लीला मत समझो गुड़ को चीला ।
यामें सुर नर मुनि गये हार जपे जा राधे राधे ॥ [4]
बृन्दावन रास रचायो शिव गोपी भेष बनायो ।
हो वंशीवट कियो विहार जपे जा राधे राधे ॥ [5]
यह प्रेम की अकथ कहानी, नहीं समझै ज्ञानी ध्यानी ।
हो याहि समझें बृज की नारि, जपे जा राधे राधे ॥ [6]
या बृन्दावन में आयो, तेने राधा नाम न गायो ।
तेरे जीवन को धिक्कार, जपे जा राधे राधे ॥ [7]
राधा बृषभान दुलारी, श्रीकृष्णचन्द्र की प्यारी ।
हो वह कीरति राज कुमार, जपे जा राधे राधे ॥ [8]
मोहन मुरली में गावे, वन वन में धेनु चरावे ।
सुनि-सुनि मगन होंय बृज नारि, जपे जा राधे राधे ॥ [9]
या वृन्दावन के वासी, श्री राधा नाम उपासी ।
हो यहाँ है रहो नित्य विहार, जपे जा राधे राधे ॥ [10]
कुञ्जन में रास रचायो, 'श्रीअलीमाधुरी' गायो ।
वह निरखें नित्य विहार, जपे जा राधे राधे ॥ [11]
- श्री अली माधुरी जी

अरे मन, श्री वृन्दावन धाम अपार है, तू नित्य ही राधे-राधे जपे जा, राधे राधे जपे जा और राधे राधे भजे जा । [1]

जो राधा-राधा गाता है, उसे ही प्रेम रूपी फल प्राप्त होता है, उसी जीव का ही कल्याण होता है, इसलिए तू राधे-राधे जपे जा । [2]

यदि श्री राधा नाम न होता, तो बिचारे रसराज श्री कृष्ण रोते रहते एवं उनका अवतार ही न होता, इसलिए तू राधे-राधे जपे जा । [3]

वृन्दावन की इस दिव्य लीला को गुड़ का चीला न समझो, इसकी प्राप्ति में सुर-नर-मुनि भी हार गए हैं, इसलिए तू राधे-राधे जपे जा । [4]

श्री कृष्ण ने जब वृन्दावन में रास रचाया था, तब भगवान शिव गोपी के वेश में आये थे, एवं वंशीवट पर श्री राधा-कृष्ण ने विहार किया था, इस दिव्य-रस की प्राप्ति के लिए तू राधे-राधे जपे जा । [5]

श्री राधा-कृष्ण के अकथनीय त्रिगुणातीत दिव्य प्रेम को ज्ञानी एवं ध्यानी भी नहीं समझ पाते, इसे तो ब्रजांगनाएँ ही समझतीं हैं, इसलिए तू राधे-राधे जपे जा । [6]

यदि आप वृन्दावन में आये और राधा नाम न गाया तो आपके जीवन को धिक्कार है, इसलिए तू राधे-राधे जपे जा । [7]

वृषभानु दुलारी श्री राधा श्री कृष्ण की प्राण-प्यारी हैं, एवं श्री कीरति दुलारी राजकुमारी हैं, इनके चरणों की प्राप्ति के लिए तू राधे-राधे जपे जा । । [8]

वन-वन में गायों को चराते हुए मनमोहन श्री कृष्ण अपनी वंशी में श्री राधा नाम ही गान करते हैं, जिसे सुन-सुनकर ब्रजनारी उन्मत्त हो जातीं हैं, इसलिए तू राधे-राधे जपे जा । [9]

इस वृन्दावन के वासी श्री राधा नाम के उपासी हैं, यहाँ तो सदैव नित्य-विहार हो रहा है, इसलिए तू राधे-राधे जपे जा । [10]

श्री अली माधुरी जी कहते हैं कि वृन्दावन की कुंजों में श्री राधा कृष्ण रास नृत्य कर रहे हैं, जिसका मैं गान कर रहा हूँ । जो सदैव राधे-राधे जपता है वही इस नित्य-विहार का दर्शन कर पाता है । [11]