(राग केदार)
जाके दरश को जग तरसत है
ताहि दरश तू दे मेरी प्यारी। [1]
जाकी मुरली की धुनि सुर मोहे
ता तन नेक चितै मेरी प्यारी॥ [2]
शिव विरंचि जाको पार न पावत
सो तेरे पग परसै री प्यारी। [3]
सूरदास वश तीन लोक जाके
सो तेरे वश है मेरी प्यारी॥ [4]
- श्री सूरदास
श्री सूरदास जी माननी श्री राधिका से कहते हैं: हे मेरी राधा प्यारी, जिस श्री कृष्ण के दर्शन को समस्त जग तरसता है, अब तू उसको दर्शन दे। [1]
जिसकी मुरली की धुन सुनकर सुरों और मुनियों के मन मोह लिए गए हैं, उन श्री कृष्ण की ओर थोड़ा सा तो देख लीजिए। [2]
भगवान शंकर और ब्रह्मा, जिसका पार भी नहीं पा सके, वही परम ब्रह्म श्री कृष्ण तुम्हारे चरणों के स्पर्श के लिए व्याकुल हैं। [3]
श्री सूरदास जी कहते हैं कि हे मेरी प्यारी [राधा]! तीनों लोक भी जिनके वश में हैं, वही भगवान श्री कृष्ण नित्य तुम्हारे वश में हैं। [4]
जाके दरश को जग तरसत है
ताहि दरश तू दे मेरी प्यारी। [1]
जाकी मुरली की धुनि सुर मोहे
ता तन नेक चितै मेरी प्यारी॥ [2]
शिव विरंचि जाको पार न पावत
सो तेरे पग परसै री प्यारी। [3]
सूरदास वश तीन लोक जाके
सो तेरे वश है मेरी प्यारी॥ [4]
- श्री सूरदास
श्री सूरदास जी माननी श्री राधिका से कहते हैं: हे मेरी राधा प्यारी, जिस श्री कृष्ण के दर्शन को समस्त जग तरसता है, अब तू उसको दर्शन दे। [1]
जिसकी मुरली की धुन सुनकर सुरों और मुनियों के मन मोह लिए गए हैं, उन श्री कृष्ण की ओर थोड़ा सा तो देख लीजिए। [2]
भगवान शंकर और ब्रह्मा, जिसका पार भी नहीं पा सके, वही परम ब्रह्म श्री कृष्ण तुम्हारे चरणों के स्पर्श के लिए व्याकुल हैं। [3]
श्री सूरदास जी कहते हैं कि हे मेरी प्यारी [राधा]! तीनों लोक भी जिनके वश में हैं, वही भगवान श्री कृष्ण नित्य तुम्हारे वश में हैं। [4]

