श्रीनागरीदास अनन्य धन, धर्म सुदृढ उर धारि - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी (15)

श्रीनागरीदास अनन्य धन, धर्म सुदृढ उर धारि - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी (15)

श्रीनागरीदास अनन्य धन, धर्म सुदृढ उर धारि ।
दंपति सम्पति संचि हियै, सुख सोवो पाँव पसारि ॥
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी( 15)

श्री नागरीदास जी कहते हैं कि अनन्य भक्ति ही सच्चा धन है, इस धर्म को अपने हृदय में दृढ़ता से धारण कर लो। युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) के अनन्य प्रेम रूपी संपत्ति को अपने हृदय में संचित कर लो; फिर तुम निश्चिंत होकर, पाँव पसार कर परम सुख की नींद सो सकते हो।