गैल श्रीवृन्दावनकी गहिये - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (228)

गैल श्रीवृन्दावनकी गहिये - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (228)

(राग देस)
गैल श्रीवृन्दावनकी गहिये ।
सेवाकुंज कौनमें बैठे जुगुललाल छवि लहिये ॥ [1]
रसिकनके पग चांपि हुलसिये श्यामगौर मुख कहिये ।
'ललितकिशोरी' जाविधि राखैँ ताहीविधि मन रहिये ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (228)

श्री वृन्दावन के मार्ग में ही अनन्यता पूर्वक बढ़ना चाहिए। सेवाकुंज के कोने में बैठे युगल किशोर श्री राधा कृष्ण की छवि को निहारना चाहिए । [1]

श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि रसिकों के चरणों की सेवा कर, ह्रदय से प्रसन्न होकर, मुख से दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण के नाम का उच्चारण करते रहिये । श्री ललित किशोरी [श्री राधिका] हमें जैसे रखें, उसी में सुख पूर्वक रहिये । [2]