राधिका सम नागरी नवीन को प्रवीन सखी - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (72)

राधिका सम नागरी नवीन को प्रवीन सखी - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (72)

(राग सारंग)
राधिका सम नागरी नवीन को प्रवीन सखी,
रूप गुन सुहाग भाग आगरी न नारि। [1]
वरुन नागओक भूमि देवलोककी कुमारि,
प्यारीजू के रोम ऊपर डारौं सब वारि॥ [2]
आनँदकन्द नंदनँदन जाके रसरंग रच्यौ,
अंग वर सुधंग नच्यौ मानतु है अति हारि। [3]
ताके वल गर्वभरे रसिकव्यास से न डरे,
लोक वेद कर्म धर्म छाँड़ि मुकुति चारि॥ [4]

- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (72)

हे सखी, श्री राधा के समान निपुण, नवीन एवं प्रवीण कौन है? उनके रूप, गुण, सुहाग और भाग्य की समानता तीनों लोकों की कोई भी नारी नहीं कर सकती। [1]

वरुणलोक, नागलोक, देवलोक और धरती की समस्त कुमारियाँ, श्री प्यारी जू के एक रोम पर न्योंछावर हैं। [2]

आनंद के धाम नंदनंदन श्री कृष्ण जिनके प्रेम-रस के रंग में रचे हैं, उन श्री राधा के अंग से अंग मिलाकर सुधंग नृत्य करते हुए वे भी अपनी पराजय स्वीकार करते हैं। [3]

श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि उन्हीं श्री राधा के बल के गर्व में मैंने लोक, वेद, कर्म, धर्म और चारों प्रकार की मुक्ति का निर्भयता पूर्वक त्याग कर दिया है। [4]