जाके हित में लाडिली, ताकौं विघन न कोई - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (651)

जाके हित में लाडिली, ताकौं विघन न कोई - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (651)

जाके हित में लाडिली, ताकौं विघन न कोई।
ताकौ बार न बॉकाई, जो जग बैरी होइ॥

- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (651)

जिसके पक्ष में स्वयं लाडिली जी (श्री राधा) हो जाती हैं, उसके मार्ग में फिर कोई बाधा या विघ्न शेष नहीं रहता। चाहे संपूर्ण संसार ही उसका शत्रु क्यों न बन जाए, फिर भी उसका बाल भी बाँका नहीं हो सकता।