(सवैया)
अजन्म सदाँ जहाँ जन्म लियौ, भवसिन्धु परै नहीं जीव विचारौ। [1]
चोर वनौ जग कौ रचतावन, रक्षक है जो संहारन हारौ॥ [2]
निष्कर्म सुनौं श्रुति सौं जेहि को, बृज गोपिन सौं अनुराग निहारौ। [3]
बाँके बिहारी विराजै 'छबीले' सु, श्री वनराज है धाम हमारौ॥ [4]
- श्री छबीले जी
जो भगवान सदा अजन्मा होते हुए भी ब्रज में जन्म लेते हैं, उस ब्रज धाम में रहने वाला जीव संसार-सागर में कभी नहीं फँसता। [1]
जो अनंत ब्रह्मांडों के रचयिता हैं, वही ब्रज धाम में चोरी-लीला संपन्न करते हैं। वे दुष्टों के संहारक और शरणागतों के रक्षक हैं। [2]
वेद जिसको निष्कर्म बताते हैं, वही ब्रज की गोपियों के प्रति अद्भुत प्रेम रखते हैं। [3]
श्री छबीले जी कहते हैं कि वही रसीले ठाकुर श्री बाँके बिहारी जी महाराज वृन्दावन धाम में विराजमान हैं, वही वनराज मेरा निजधाम है। [4]
अजन्म सदाँ जहाँ जन्म लियौ, भवसिन्धु परै नहीं जीव विचारौ। [1]
चोर वनौ जग कौ रचतावन, रक्षक है जो संहारन हारौ॥ [2]
निष्कर्म सुनौं श्रुति सौं जेहि को, बृज गोपिन सौं अनुराग निहारौ। [3]
बाँके बिहारी विराजै 'छबीले' सु, श्री वनराज है धाम हमारौ॥ [4]
- श्री छबीले जी
जो भगवान सदा अजन्मा होते हुए भी ब्रज में जन्म लेते हैं, उस ब्रज धाम में रहने वाला जीव संसार-सागर में कभी नहीं फँसता। [1]
जो अनंत ब्रह्मांडों के रचयिता हैं, वही ब्रज धाम में चोरी-लीला संपन्न करते हैं। वे दुष्टों के संहारक और शरणागतों के रक्षक हैं। [2]
वेद जिसको निष्कर्म बताते हैं, वही ब्रज की गोपियों के प्रति अद्भुत प्रेम रखते हैं। [3]
श्री छबीले जी कहते हैं कि वही रसीले ठाकुर श्री बाँके बिहारी जी महाराज वृन्दावन धाम में विराजमान हैं, वही वनराज मेरा निजधाम है। [4]

