ब्रज मण्डल का ही सितार नहीं - ब्रज के सेवैया

ब्रज मण्डल का ही सितार नहीं - ब्रज के सेवैया

ब्रज मण्डल का ही सितार नहीं, जग तीतल का उजियारा है तू। [1]
मन मोहकता इतनी तुझमें, सबके मन को अति प्यारा है तू॥ [2]
यह जीवन क्यों न न्योछावर हो, जब जीवन का ही सहारा है तू। [3]
किस भांति बिसांरू बता तुझको, मनमोहन प्राण पियारा है तू॥ [4]

- ब्रज के सेवैया

हे कृष्ण! तू केवल ब्रज का रत्न नहीं, पूरे संसार का उजाला है। [1]

तेरे आकर्षक स्वरूप ने सबको अपना बना लिया है, तू सबका हृदयहारक है। [2]

जब तू ही जीवन का सहारा है, तो यह जीवन क्यों न तुझ पर न्योछावर हो जाए। [3]

हे मनमोहन! जब तू मेरे प्राणों से भी प्रिय है, तो मैं तुझे कैसे भूलूँ? [4]