उलटौ पंथ है प्रेम कौ, तहाँ रह्यौ मन हारि।
जसहू सुनि लागत बुरौ, मीठी लागति गारि ॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (60)
प्रेम का मार्ग सर्वथा उलटा और अनोखा है, जहाँ मन का अहंकार और उसकी गति समाप्त हो जाती है; इसी कारण इस प्रेम-पंथ में अपनी स्तुति अप्रिय लगती है और अपमान भी मधुर प्रतीत होता है।

