(राग विभास)
आज बनी लाड़िली प्रीतम संग आवति । [1]
सौंधे भींजी लट छूटीं, पिय के अंस भुज पाछैं,
सखी सुघर विभासहिं गावति ॥ [2]
स्रम जल बिंदु निसि के सुख सूचत,
मोहन बदन सों बदन मिलावति । [3]
श्रीबीठलविपुल कल रसिक बिहारी लाल,
आनंद समुद्र मथि मदन झिलावति ॥ [4]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (2)
इस पद में प्रातःकाल की शोभा का वर्णन किया गया है ।
अद्भुत सौन्दर्य छटा से सुशोभित लाड़िलीजू अपने प्रियतम के संग अभिगमन कर रही हैं । [1]
दिव्य सुगंध से अभिसिंचित लटपाश छूट रहे हैं, प्रियाजू प्रियतम के कंधे पर भुजा रखे हुए हैं । श्रीयुगल के पीछे सखियाँ सुंदर मधुर 'विभास' राग का गायन कर रही हैं । [2]
श्रीप्रियाजू के मुखारविन्द पर जल के विन्दु सुशोभित हो रहे हैं जो रात्रिकालीन केलिजनित प्रतीक उस दिव्यानंद को उजागर कर रहे हैं । वे श्रीमोहन लालजू के साथ अंग से अंग को आश्लेषित कर रही हैं । [3]
श्री विट्ठल विपुल देव जी कहते हैं कि श्री रसिकबिहारी लाल रूपी आनन्द-सिंधु का मंथन कर मदन-रंग को उद्भासित कर रही हैं । [4]
आज बनी लाड़िली प्रीतम संग आवति । [1]
सौंधे भींजी लट छूटीं, पिय के अंस भुज पाछैं,
सखी सुघर विभासहिं गावति ॥ [2]
स्रम जल बिंदु निसि के सुख सूचत,
मोहन बदन सों बदन मिलावति । [3]
श्रीबीठलविपुल कल रसिक बिहारी लाल,
आनंद समुद्र मथि मदन झिलावति ॥ [4]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (2)
इस पद में प्रातःकाल की शोभा का वर्णन किया गया है ।
अद्भुत सौन्दर्य छटा से सुशोभित लाड़िलीजू अपने प्रियतम के संग अभिगमन कर रही हैं । [1]
दिव्य सुगंध से अभिसिंचित लटपाश छूट रहे हैं, प्रियाजू प्रियतम के कंधे पर भुजा रखे हुए हैं । श्रीयुगल के पीछे सखियाँ सुंदर मधुर 'विभास' राग का गायन कर रही हैं । [2]
श्रीप्रियाजू के मुखारविन्द पर जल के विन्दु सुशोभित हो रहे हैं जो रात्रिकालीन केलिजनित प्रतीक उस दिव्यानंद को उजागर कर रहे हैं । वे श्रीमोहन लालजू के साथ अंग से अंग को आश्लेषित कर रही हैं । [3]
श्री विट्ठल विपुल देव जी कहते हैं कि श्री रसिकबिहारी लाल रूपी आनन्द-सिंधु का मंथन कर मदन-रंग को उद्भासित कर रही हैं । [4]

