बलि जाऊं प्रेम-रस-सार की ।
नागर अरु नागरी गुण-आगरी, मूरती रूप सिंगार की ॥ [1]
ललित लवंग-लता-कुंजन महँ, रति-रस-सरस-बिहार की ।
रास विलास-हास-परिहासन, बरसावत रस धार की ॥ [2]
रूप-लुभाने जनू अलसाने, दिवाने दृग-चार की।
यह 'कृपालु' कछु अकथ कहानी, युगल-माधुरी प्यार की ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, प्रेम माधुरी (7)
श्री राधा-कृष्ण के प्रेम की मधुरता पर मैं बार-बार स्वयं को न्योंछावर करता हूँ । रसिकों के चूड़ामणि प्रिय श्री श्यामसुंदर एवं उनकी प्राण-प्यारी रस की खान श्री राधिका जी पर मैं स्वयं को अनंत बार न्योंछावर करता हूँ । प्रिय श्री श्यामसुन्दर सौन्दर्य के मूर्तिमान स्वरुप हैं एवं श्री राधा श्रृंगार की । [1]
सुन्दर लवंग-लता की कुञ्ज में श्री श्यामाश्याम के रस-सिक्त अचिन्त्य प्रेम क्रीड़ा पर मैं स्वयं को न्योंछावर करता हूँ । महारास में श्री राधा कृष्ण के हास-परिहास युक्त रास-विलास से बरसते हुए रस की धारा पर मैं स्वयं को न्योंछावर करता हूँ । [2]
कुछ अलसाये हुए श्री राधा कृष्ण के रस-सिक्त नेत्र, प्रेम के वशीभूत हो एक-दूसरे को निहार रहे हैं, इनके कमल नयनों पर मैं स्वयं को न्योंछावर करता हूँ। जगद्गुरु श्री कृपालु जी कहते हैं, "युगल किशोर श्री राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम क्रीड़ा अवर्णनीय और अकल्पनीय हैं, जिन्हें केवल राधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त रसिकों से ही समझा जा सकता है, किसी और उपाय से नहीं । [3]
नागर अरु नागरी गुण-आगरी, मूरती रूप सिंगार की ॥ [1]
ललित लवंग-लता-कुंजन महँ, रति-रस-सरस-बिहार की ।
रास विलास-हास-परिहासन, बरसावत रस धार की ॥ [2]
रूप-लुभाने जनू अलसाने, दिवाने दृग-चार की।
यह 'कृपालु' कछु अकथ कहानी, युगल-माधुरी प्यार की ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, प्रेम माधुरी (7)
श्री राधा-कृष्ण के प्रेम की मधुरता पर मैं बार-बार स्वयं को न्योंछावर करता हूँ । रसिकों के चूड़ामणि प्रिय श्री श्यामसुंदर एवं उनकी प्राण-प्यारी रस की खान श्री राधिका जी पर मैं स्वयं को अनंत बार न्योंछावर करता हूँ । प्रिय श्री श्यामसुन्दर सौन्दर्य के मूर्तिमान स्वरुप हैं एवं श्री राधा श्रृंगार की । [1]
सुन्दर लवंग-लता की कुञ्ज में श्री श्यामाश्याम के रस-सिक्त अचिन्त्य प्रेम क्रीड़ा पर मैं स्वयं को न्योंछावर करता हूँ । महारास में श्री राधा कृष्ण के हास-परिहास युक्त रास-विलास से बरसते हुए रस की धारा पर मैं स्वयं को न्योंछावर करता हूँ । [2]
कुछ अलसाये हुए श्री राधा कृष्ण के रस-सिक्त नेत्र, प्रेम के वशीभूत हो एक-दूसरे को निहार रहे हैं, इनके कमल नयनों पर मैं स्वयं को न्योंछावर करता हूँ। जगद्गुरु श्री कृपालु जी कहते हैं, "युगल किशोर श्री राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम क्रीड़ा अवर्णनीय और अकल्पनीय हैं, जिन्हें केवल राधा-कृष्ण की कृपा प्राप्त रसिकों से ही समझा जा सकता है, किसी और उपाय से नहीं । [3]

