कोटि कोटि कामधेनु कोटि कोटि कलपतरु,
चिंतामनि कोटि याकी समता न पावैं हैं। [1]
रमा सिव इन्द्र मुखिया हैं जिन माहिं,
तिन सौं दुरम्य ताकौ मारग बतावैं हैं॥ [2]
जाकी दिव्य महिमा कौं सकत बखानौ कोन,
रज कन हूँ के ओर छोर कौन विधि पावै हैं। [3]
ऐसी वृन्दावटी सर्वोपरि बिराजमान,
जापै हित कृपा करैं ताकौं अपनावैं हैं॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
कोटि-कोटि कामधेनु, कोटि-कोटि कल्पतरु वृक्ष और कोटि-कोटि चिंतामणि भी श्री वृन्दावन की समानता नहीं कर सकते। [1]
सृष्टि के पालनकर्ता श्री लक्ष्मी जी, श्री शिव जी, देवराज इंद्र आदि जितने भी पूजनीय हैं, उनके लिए भी श्री वृन्दावन दुरम्य है। [2]
श्री वृन्दावन की दिव्य महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जिसके रज-कण का ही ओर-छोर पाने में कोई समर्थ नहीं है। [3]
श्री वृन्दावन समस्त लोकों में सर्वोपरि विराजमान है, जिस पर श्री राधा कृष्ण कृपा करते हैं, उसी को श्री वृन्दावन धाम अपनाता है। [4]
चिंतामनि कोटि याकी समता न पावैं हैं। [1]
रमा सिव इन्द्र मुखिया हैं जिन माहिं,
तिन सौं दुरम्य ताकौ मारग बतावैं हैं॥ [2]
जाकी दिव्य महिमा कौं सकत बखानौ कोन,
रज कन हूँ के ओर छोर कौन विधि पावै हैं। [3]
ऐसी वृन्दावटी सर्वोपरि बिराजमान,
जापै हित कृपा करैं ताकौं अपनावैं हैं॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
कोटि-कोटि कामधेनु, कोटि-कोटि कल्पतरु वृक्ष और कोटि-कोटि चिंतामणि भी श्री वृन्दावन की समानता नहीं कर सकते। [1]
सृष्टि के पालनकर्ता श्री लक्ष्मी जी, श्री शिव जी, देवराज इंद्र आदि जितने भी पूजनीय हैं, उनके लिए भी श्री वृन्दावन दुरम्य है। [2]
श्री वृन्दावन की दिव्य महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जिसके रज-कण का ही ओर-छोर पाने में कोई समर्थ नहीं है। [3]
श्री वृन्दावन समस्त लोकों में सर्वोपरि विराजमान है, जिस पर श्री राधा कृष्ण कृपा करते हैं, उसी को श्री वृन्दावन धाम अपनाता है। [4]

