अमंद प्रेमार्द्रात्किसलयमयात्केलिशयनादुषस्युत्थायाब्जारूणतर कपोलोतिरुचिरा ॥
गृहंयांती श्रांति स्थगितरास्यां बुजगतं घनीभूतं राधारसमनुदिनं में वितरतु ॥
- श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (5)
प्रियतम के चर्वित ताम्बूल को मुख में रख केलिशयन उपरांत उषा काल में जग कर अरुण कपोल वर्णित ताम्बूल प्रक्षेप का विचार करने वाली, कुञ्ज से घर को पधारते समय मार्ग में कुछ समय विश्राम कर जिनके अंग केलिशयन से शिथिल हैं, वे श्री राधा मुझे नित्य अपनी चर्वित ताम्बूल प्रदान करें ।
गृहंयांती श्रांति स्थगितरास्यां बुजगतं घनीभूतं राधारसमनुदिनं में वितरतु ॥
- श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (5)
प्रियतम के चर्वित ताम्बूल को मुख में रख केलिशयन उपरांत उषा काल में जग कर अरुण कपोल वर्णित ताम्बूल प्रक्षेप का विचार करने वाली, कुञ्ज से घर को पधारते समय मार्ग में कुछ समय विश्राम कर जिनके अंग केलिशयन से शिथिल हैं, वे श्री राधा मुझे नित्य अपनी चर्वित ताम्बूल प्रदान करें ।

