क्वास ! क्वास ! हो स्वामिनी, महाबहु सुख - रासि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (6)

क्वास ! क्वास ! हो स्वामिनी, महाबहु सुख - रासि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (6)

क्वास ! क्वास ! हो स्वामिनी, महाबहु सुख - रासि ।
सरनागत प्रतिपाल कैं पुजवौ मन की आस ॥ [1]
पुजवौ मन की आस सबै जो सरनै आयौ ।
हौं अति दीन अनाथ तुम्हारे हाथ बिकायौ ॥ [2]
महा विषै जुग ज्वाल दहत मोहि आन बचावौ ।
प्रेम भरे दृग चारु चितै रस सींच जिवावौ ॥ [3]

- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (6)

हे सुख की राशि स्वरूपा स्वामिनी [श्री राधा], तुम कहाँ हो? कहाँ हो? मुझ शणागत का प्रतिपालन करके मेरे मन की अभिलाषा [तुम्हारे दर्शन एवं सेवा] को पूर्ण करो । [1]

हे श्री राधे, मैं आपके शरण में आया हूँ, मेरे मन की समस्त आशाओं को पूर्ण कीजिये । मैं अति दीन एवं अनाथ हूँ, मैं आपके हाथों बिना मोल के बिक गया हूँ । [2]

श्री अलबेली अलि जी कहते हैं कि मैं संसार के महा विषय की अग्नि में जल रहा हूँ, मुझे आकर बचा लीजिये । अपनी प्रेम भरी दृष्टिपात के दिव्य रस से सींच कर मुझे पुनः जीवनदान प्रदान कीजिये । [3]