जिन श्रीराधा के करैं नित श्रीहरि गुन गान - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (12)

जिन श्रीराधा के करैं नित श्रीहरि गुन गान - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (12)

(राग भैरवी – ताल कहरवा)
जिन श्रीराधा के करैं नित श्रीहरि गुन गान ।
जिन के रस-लोभी रहैं नित रसमय रसखान ॥ [1]
प्रेम भरे हिय सौं करैं स्रवन-मनन, नित ध्यान ।
सुनत नाम 'राधा' तुरत भूलै तन कौ भान ॥ [2]
करैं नित्य दृग-अलि मधुर मुख-पंकज-मधु-पान ।
प्रमुदित, पुलकित रहैं लखि अधर मधुर मुसुकान ॥ [3]
जो आत्मा हरि की परम, जो नित जीवन- प्रान ।
बिसरि अपुनपौ रहैं नित जिन के बस भगवान ॥ [4]
सहज दयामयि राधिका, सो करि कृपा महान ।
करत रहैं मो अधम कौं सदा चरन रज दान ॥ [5]

- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (12)

जिन श्री राधा का श्री कृष्ण नित्य गुण-गान करते हैं, उन्हीं श्री राधा के प्रेम रस में रसखान श्री कृष्ण लोभी बने रहते हैं । [1]

श्री कृष्ण अपने ह्रदय में बड़े प्रेम से श्री राधा का श्रवण-मनन एवं नित्य ध्यान करते हैं । श्री राधा नाम को सुनते ही श्री कृष्ण को अपने देह का भान नहीं रहता । [2]

श्री कृष्ण अपने कमल नयनों से नित्य श्री राधा के मुख-कमल की रूप-माधुरी-रस का पान करते हैं । श्री राधा की मधुर मुस्कान को देखकर श्री कृष्ण ह्रदय से पुलकित हो जाते हैं । [3]

श्री राधा श्री कृष्ण की परम आत्मा हैं, नित्य ही उनकी जीवन-प्राण हैं । श्री राधा के वश में होकर श्री कृष्ण नित्य ही स्वयं को भूले रहते हैं । [4]

श्री राधिका सहज ही दयामयि हैं एवं महत कृपा करने वाली हैं । मेरी यही अभिलाषा है कि मुझ जैसे अधम पर वे कृपा कर सदा अपने निज चरणों की रज दान करें । [5]