मन मनसा आसा मगन, तन की कछु न सम्हार - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (446)

मन मनसा आसा मगन, तन की कछु न सम्हार - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (446)

मन मनसा आसा मगन, तन की कछु न सम्हार ।
श्रीबिहारिदास नामु न कहै, निरखै नित्य विहार ।।

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (446)

श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि यद्यपि हम मुख से नाम का उच्चारण नहीं करते, तथापि श्री बिहारी-बिहारिनी जू के उस दिव्य नित्य-विहार का निरंतर ऐसा चिंतन और अवलोकन करते हैं कि हमारा मन, मनसा, आशा और प्राण पूर्णतः उसी में लीन रहते हैं तथा शरीर की कोई सुध-बुध शेष नहीं रहती।