(राग बिहागरौ)
दूलह दुलहिन अधिक बनी ।
पूजन चली कल्पतरु सुन्दरि औरहि ठान ठनी ॥ [1]
कियो है सखिन गठ जोर सबन मिलि आगे धन पाछे जु धनी ।
गावत चली गीत मंगल के सबही सुघर सजनी ॥ [2]
रुनक झुनक पग धरत धरनि पर छबि पावत अवनी ।
छिरकि सुगन्ध मूल तरु पूज्यौ फूलनि माल धनी ॥ [3]
अंचल जोरि यहै वर मांगौं रहौ यह प्रेम सनी ।
श्री रसिक बिहारिनि होहु न मान छक केल कला कमनी ॥ [4]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (25)
नित्य दूल्हा दुलहिन श्री राधा कृष्ण आज सम्पूर्ण श्रृंगार से सज्जित हैं । दोनों कल्पतरु वृक्ष की पूजा करने चले हैं, लेकिन आज यहाँ बात कुछ और है । [1]
सखियाँ श्री राधा कृष्ण के वस्त्रों को एक दुपट्टे के साथ बाँध देती हैं । श्री कृष्ण श्री राधा से दो कदम पीछे हैं । सभी सखियाँ मधुर स्वर में मंगल गीत गा रही हैं । [2]
श्री राधा जब कदम बढ़ा रही हैं तब उनके चरण कमलों में सुशोभित नूपुर रुनक-झुनक की मधुर ध्वनियाँ उत्पत्न कर रही हैं । श्री राधा कृष्ण की छवि बहुत ही सुन्दर है । दोनों कल्पतरु वृक्ष के मूल में सुगन्धि एवं पुष्पों की माला अर्पण कर पूजा कर रहे हैं । [3]
श्री राधा और कृष्ण दोनों अपना आँचल फैलाकर कल्पतरु वृक्ष से प्रार्थना कर रहे हैं कि दोनों एक-दूसरे के प्रेम में नित्य सने रहें । श्री रसिकदेव जी राधा और कृष्ण के प्रति आसक्त हैं, जो प्रेम के समस्त कलाओं में चूड़ामणि हैं । [4]
दूलह दुलहिन अधिक बनी ।
पूजन चली कल्पतरु सुन्दरि औरहि ठान ठनी ॥ [1]
कियो है सखिन गठ जोर सबन मिलि आगे धन पाछे जु धनी ।
गावत चली गीत मंगल के सबही सुघर सजनी ॥ [2]
रुनक झुनक पग धरत धरनि पर छबि पावत अवनी ।
छिरकि सुगन्ध मूल तरु पूज्यौ फूलनि माल धनी ॥ [3]
अंचल जोरि यहै वर मांगौं रहौ यह प्रेम सनी ।
श्री रसिक बिहारिनि होहु न मान छक केल कला कमनी ॥ [4]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (25)
नित्य दूल्हा दुलहिन श्री राधा कृष्ण आज सम्पूर्ण श्रृंगार से सज्जित हैं । दोनों कल्पतरु वृक्ष की पूजा करने चले हैं, लेकिन आज यहाँ बात कुछ और है । [1]
सखियाँ श्री राधा कृष्ण के वस्त्रों को एक दुपट्टे के साथ बाँध देती हैं । श्री कृष्ण श्री राधा से दो कदम पीछे हैं । सभी सखियाँ मधुर स्वर में मंगल गीत गा रही हैं । [2]
श्री राधा जब कदम बढ़ा रही हैं तब उनके चरण कमलों में सुशोभित नूपुर रुनक-झुनक की मधुर ध्वनियाँ उत्पत्न कर रही हैं । श्री राधा कृष्ण की छवि बहुत ही सुन्दर है । दोनों कल्पतरु वृक्ष के मूल में सुगन्धि एवं पुष्पों की माला अर्पण कर पूजा कर रहे हैं । [3]
श्री राधा और कृष्ण दोनों अपना आँचल फैलाकर कल्पतरु वृक्ष से प्रार्थना कर रहे हैं कि दोनों एक-दूसरे के प्रेम में नित्य सने रहें । श्री रसिकदेव जी राधा और कृष्ण के प्रति आसक्त हैं, जो प्रेम के समस्त कलाओं में चूड़ामणि हैं । [4]

