श्री ब्रजजीवन जी की जीवनी

श्री ब्रजजीवन जी की जीवनी

परिचय :
श्री ब्रजजीवन जी का जन्म 1738 के लगभग हुआ था । भक्त-चरित्रों को पढ़ने की स्वाभाविक प्रवृत्ति इन्हें अपने माता पिता से पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त हुई होगी । नाभाजी द्वारा विरचित भक्तमाल तथा प्रियादास जी द्वारा लिखित उसकी टीका ने इन्हें विशेष रूप से आकृष्ट किया और साथ ही काव्यमय भक्त चरित्र लिखने की प्रेरणा भी प्रदान की, जिसके परिणाम स्वरूप इन्होंने 1760 में "सत्संग सार" नामक एक ग्रन्थ का निर्माण किया ।
अपने तरुणावस्था में इन्हें अपने समानमना हरेरामजी (गाजीपुर निवासी) तथा रामप्रसाद जी का प्रश्रय प्राप्त हुआ । इन्हीं दोनों के प्रश्रय काल में इन्होंने 'गाजीपुर निवासी हरे-राम विलास' (हरेरामजी दिनचर्या), 'रामचन्द्र की सवारी' तथा 'मांझ भक्तमाल' इन तीनों ग्रन्थों की रचना की । वहीं पर इन्हें रीतिकालीन बिहारी, मतिराम, घनानन्द, आलम आदि कवियों की रचनाएँ पढ़ने को मिलीं । इन रचनाओं ने इनके मन में श्रृंगारी भावनाओं का जागरण किया । तरुणावस्था की स्वाभाविक रुचि ने इन भावनाओं को और भी वेगवान बना दिया । कुछ कालोपरांत इन्हें वृन्दावन-रस-रसिकों का संग प्राप्त हुआ और ये वृन्दावन आ गये । रसिक संग ने इनकी श्रृंगारी भावनाओं का विशोधन करके उसे निखरे हुए स्वर्ण की भाँति चमका दिया । इस कायाकल्प ने इन्हें वृन्दावन-रस-रसिक बना दिया और उनके हृदय से वृन्दावन-रस-सिंचित भावोद्गार निकलने लगे ।
 
दीक्षा :
ब्रजजीवन जी को रसोपासना की मन्त्र दीक्षा राधावल्लभीय सम्प्रदायाचार्य गोस्वामी हित हरिवंश वंशोद्भव गोस्वामी हरिलाल जी से प्राप्त हुई थी । ब्रजजीवन जी ने अपने ग्रन्थ 'हृदयाभरण' में स्वयं ही गोस्वामी हरिलाल जी को गुरु रूप में स्मरण किया है -
 
हाव भाव सब विधि कहे हित पद्धति अनुसार ।
गुरु हरिलाल कृपाल बल निरख्यौ जुगल बिहार ॥
मैंने अपने गुरु गोस्वामी हरिलाल जी की कृपा से युगल किशोर श्री श्यामाश्याम के नित्यविहार का दर्शन किया है । 
 
ब्रजजीवन जी ने लीला वर्णनात्मक रचनाओं में अनेक स्थलों पर अपने गुरुवर्य गोस्वामी हरिलाल जी को 'हरि सहचरि' कहकर स्मरण किया है -
 
अति सुख सरसत हित 'हरि सहचरि' लेत तान,
बरसत रंग व्रजजीवन निहाल की।
अद्भुत सुख की वर्षा हो रही है, 'हरि सहचरी' तान अलाप रहीं हैं, इस रस का दर्शन कर मैं निहाल हो गया हूँ । 
 
छिरकन अतर रंग पिचकारिनु तान तान,
बरसन अभंग 'हरि सहचरि' सुख जाल की ॥
पिचकारी में अतर-रंग भर के श्री जुगल किशोर एक दूसरे पर छिड़क रहे हैं, कुछ छींटे 'हरि सहचरी' पर पड़ रहे हैं, इस छवि का सुख निरंतर बरस रहा है । 
 
संगीतज्ञ :
ढांढ़नि संगीत नाची है । जेते गति भेद न बाची है ॥
सुभग सखिनु संग हरि सहचरि ब्रजजीवना खूब नाची है॥
पग की पटक । घूमन दी लटक ॥
संगीत पर ढाढ़िन नृत्य कर रही है । ऐसा नृत्य जिसमे कोई भी गति-भेद लेना बचा नहीं है ।
सौभाग्यवान सखियों के संग हरि सहचरी भी खूब नृत्य कर रही है । 
पैरों की पटक अद्भुत है । घूमने की गति अद्भुत है ।
 
अदा सों गति भरै ठमकै । चरण में घुंघरू झमकै ॥
ढांड़िन के हाव-भाव में रानी मई है भूल ॥ (हित बधाई)
अंग-प्रत्यंग बड़ी अदा से हिल रहे हैं । चरणों में घुंघरू झलमला रहे हैं । 
ढाढ़िन के हाव-भाव युक्त इस नृत्य को देख तारा रानी सब कुछ भूल गयी हैं । 
 
उपर्युक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ब्रजजीवन जी अपने समय के लब्ध प्रतिष्ठत संगीतज्ञ थे ।
प्रबन्ध लेखन के पश्चात् प्राप्त हुए ब्रजजीवन जी के 'रसआन्हिक संत' ग्रन्थ के अध्ययन से यह तथ्य और भी प्रमाण पुष्ट हो जाता है कि इनको केवल संगीत का साधारण ज्ञान ही न था प्रत्युत वह संगीत के गायन, वादन और नृत्य इन तीनों अंगों के पूर्ण विशेषज्ञ थे ।
 
श्री वृन्दावन एवं श्री राधा सेवा के लिए प्रेम : 
श्री ब्रज जीवन जी वृन्दावन से कितना प्रेम करते थे, श्री राधारानी की निज सेवा की उनके ह्रदय में कैसी अभिलाषा थी, यह उन्होंने स्वयं वर्णन किया है -
 
जनम-जनम वास वृन्दावन दीजै मोकौं,
जनम-जनम प्यारी जू तेरौ गुन गाऊँ मैं । [1]
जनम जनम तेरी चेरिन की चेरी हौं मैं,
सुन्दर चरन मेंहदी जावक रचाऊँ मैं ।। [2]
पानदान, अतरदान आदि सब सेवा करौं,
व्यंजन साँवरि नित नौतन जिमाऊँ मैं । [3]
‘ब्रजजीवन’ स्वामिनि झमकि नाचैं मोहन सँग,
मधुर मृदंगन की परन बजाऊँ मैं ।। [4]
हे प्यारी जू [श्री राधा] जन्म-जन्म मुझे वृंदावन का वास प्रदान कीजिए और मैं आपका ही गुणगान करता रहूँ। [1]
जन्म जन्मांतर मैं आपकी दासियों की दासी बनकर रहूँ, एवं आपके सुंदर चरणों में मेहंदी एवं जावक की रचना करूँ। [2]
मैं आपकी विभिन्न प्रकार की सेवायें जैसे पानदान, इतरदान इत्यादि सब करूँ, एवं आपको विभिन्न नवीन व्यंजन संवार कर जिमाऊँ । [3]
श्री ब्रज जीवन जी कहते हैं कि हे स्वामिनी, जब आप श्याम सुंदर संग प्रफुल्लित होकर नाच रही हों तो मैं मधुर मृदंग बजाया करूँ । [4]
 
श्री ब्रज जीवन जी के ह्रदय की स्थिति : 
राधा मंगल नाम है, राधा मंगल रूप ।
राधा मूल संजीवनी, राधा केलि अनूप ॥ [1]
राधा कृपा कटाक्ष की लागी हिय बौछार ।
राधा गुन सुमिरन कथन छिन-छिन नित्य-विहार ॥ [2]
जाग्रत सुपने सैन में हिय राधा कौ ध्यान ।
अंतर-बाहर दिस-विदिस वही रूप मंडरान ॥ [3]
श्री राधा नाम मंगल करने वाला है, श्री राधा का स्वरुप भी मंगलकारी है, श्री राधा ही मेरी मूल संजीवनी है एवं उनकी केलि-लीला अनुपम है । [1]
श्री राधा की कटाक्ष रुपी कृपा मेरे ह्रदय में बरस रही है । मैं श्री राधा के गुणों का सुमिरन एवं गान करता हूँ तथा हर क्षण उनके नित्य-विहार का चिंतन-अवलोकन करता हूँ । [2]
श्री ब्रजजीवन जी कहते हैं कि जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति में मेरे ह्रदय में श्री राधा का ही ध्यान रहता है । अंदर बाहर, दिन-रात मेरे मन एवं इन्द्रियों में श्री राधा का वही सुन्दर रूप छाया रहता है । [3]
 
रचना :
ब्रजजीवन जी की रचनाएँ कितनी हैं, यह सुनिश्चित करना कठिन है लेकिन अब तक के प्राप्त खोज विवरणों के आधार पर इनके ग्रन्थों के नाम इस प्रकार हैं -
 
(1) चतुरासी सार
(2) चतुरासी माहात्म
(3) सेवक वाणी माहात्म
(4) हृदयाभरण
(5) छद्म चौवनी
(6) श्रीहित जन्म बधाई
(7) वृन्दावन संत षोडषी
(8) हरि सहचरि विलास
(9) श्रीहित वंशावली
(10) वाणी
(11) कवित्त संग्रह (359 कवित्त)
(12) वर्षोत्सव पदावली (173 पद)
(13) मंगल बड़े महाराज कौ
(14) पदावली साँझी
(15) सत्संग सार
(16) माँझ भक्तमाल
(17) गाजीपुर निवासी हरेराम विलास (हरेराम दिनचर्या)
(18) श्रीराधाजन्म बधाई
(19) रामजन्म बधाई
(20) रस आन्हिक सत