रूप की नौलासी देखैं फूल की नौलासी सखी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (41)

रूप की नौलासी देखैं फूल की नौलासी सखी - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (41)

रूप की नौलासी देखैं फूल की नौलासी सखी,
परी खसि नवल रँगीलेजू के कर ते। [1]
हाव-भाव रंगनि कै जगि-मगि रही प्यारी,
चित्र से ह्वै रहे चितै-चितै प्रेम-भर तें॥ [2]
अति ही बिचित्र सखी रही है सँभारि 'ध्रुव',
जिनि धुकि परै धर पर याही डर तें। [3]
छिन छिन प्रेम-सिंधु के तरंग नाना भाँति
रहयौ जकि थकि मन तेहि रस पर तें॥ [4]

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (41)

रूप और कोमलता की फूल-छड़ी समान प्रिया, नवल रंगीले लाल के प्रेम में शिथिल हाथों से ऐसे फिसल गईं जैसे फूल की डाली किसी के हाथ से धीरे-धीरे सरक जाए। [1]

सखियों ने देखा कि प्रिया हाव-भाव की उमंग में रंगी हुई हैं, और प्रियतम उन्हें निरंतर निहारते हुए प्रेम के प्रवाह में स्थिर हो गए हैं, मानो किसी चित्र में बंध गए हों। [2]

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि अत्यंत विलक्षण और प्रेमपूर्ण सखियाँ पूरी सतर्कता से युगल को संभाले हुए हैं। वे आशंकित हैं कि प्रेम-मद में डूबे हुए युगल कहीं अचेत होकर भूमि पर न गिर जाएँ। [3]

इस प्रकार युगल के प्रेम-सागर में हर पल नई-नई भावमयी तरंगें उठती रहती हैं। इस अद्भुत प्रेम-रस के विलास को देखकर उनके  परिकर का मन भी रस-आनंद में सराबोर होकर मदमस्त बना रहता है। [4]