हम जुगल महल रस लिंदा - श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (23)

हम जुगल महल रस लिंदा - श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (23)

हम जुगल महल रस लिंदा,
कुंज अलिंदा उलंघि न जानैं । [1]
रस दारिंदा वृन्दावनगण
चरितन हू गहि छानैं ॥ [2]
वन के वासिंदा सब निंदा करें,
सु को मन आनैं ? [3]
वल्लभरसिक चुनिंदा बिन को
निन्दा सुख पहिचानैं ॥ [4]

- श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (23)

श्री वृंदावन धाम के अनन्य रसिक जन (इस युगल महल - रस के उपासक) कुञ्ज के अलिंद (द्वार कोष्ठ) को उलांघ कर कभी बाहर नहीं जाते । [1]

वृन्दावन तो बहुत बड़ा है परन्तु इस रस के उपासकों ने रस को छानकर महल-रस को ही अपना उपास्य माना है । [2]

वृन्दावन के वासी भी इस बात के लिये हमारी निंदा करें, तो भी हम मन  में नहीं लायेंगे । [3]

श्री वल्लभ रसिक जी कहते हैं कि इस निन्दा में कितना सुख है, इसे तो चुनिन्दाओं (कुछ भाग्यशाली) के बिना अन्य कोई नहीं जान सकता। [4]