किसोरी राधे विनती करों करजोर - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (56)

किसोरी राधे विनती करों करजोर - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (56)

किसोरी राधे विनती करों करजोर।
कीजै दया दयानिधि नागरि
राखौ चरनन ओर ॥ [1]
द्वारे परी दीन हौं टेरत
अब ना बनै मुख मोर ।
दासी जान न टार विपुन तें
छवि निरखों निसिभोर ॥ [2]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (56)

हे किशोरीजी (श्री राधे), अब मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि हे दयानिधि! मुझपर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मेरा मन आपके श्री चरणों में ही नित्य लगा रहे । [1]

हे स्वामिनी, आपके द्वार पर पड़ी हुई हूँ एवं दीनता पूर्वक आपको ही पुकार रही हूँ, अब तो मैं मुख से बोल भी नहीं पा रही । हे स्वामिनी, मुझे अपनी ही दासी जान कर वृंदावन से निष्कासित मत कीजिए एवं मुझसे अब ऐसी उपासना बने कि मैं दिन-रात आपकी छवि का ही अनन्य भाव से चिंतन करती रहूँ । [2]