भानुकुल भूषण लड़ेती वृषभानु जू कौ - श्री सुंदरीकुंवरी जी

भानुकुल भूषण लड़ेती वृषभानु जू कौ - श्री सुंदरीकुंवरी जी

भानुकुल भूषण लड़ेती वृषभानु जू कौ
कृष्णचंद्र भाग्य रूपी प्रगटी हैं राधा जू। [1]
वेद हूँ न भेद लहै, विष्णु जाय नाम रटै,
गूढ गहि राखै शिव सुकृत से साधा जू॥ [2]
जा पद परस ब्रजधर का प्रभाव मुरि
चाहत दरस सुर परस अगाधा जू। [3]
गायैं कृपा किंकरी नवल नेह मतवारी,
‘सुंदरीकुँवरि’ पद वन्दि हरि राधा जू॥ [4]

- श्री सुंदरीकुंवरी जी
 
भानु कुल की चूड़ामणि भूषण, श्री वृषभानु जी की पुत्री, श्री कृष्ण की भाग्यरूपा श्री राधा आज प्रकट हुई हैं। [1]

जिनका पार वेद भी नहीं पा सकते, जिनका नाम भगवान विष्णु भी रटते हैं, और भगवान शंकर ने भी जिनको गुप्त रखा है, उन श्री राधा की भक्ति को अनंत जन्मों के सुकृत (साधन) करके अब पाया है। [2]

जिनके चरणों के स्पर्श से ब्रज भूमि अद्भुत प्रभावशाली हो गई है, जिनके अद्वितीय दर्शन पाने के लिए देवता भी तरसते रहते हैं। [3]

नवल नेह में मतवाली होकर किंकरी देह को गुरु-कृपा से प्राप्त कर, श्री सुंदरि कुँवरी जी दिव्य युगल श्री हरि-राधा के चरणों का वंदन कर रही हैं। [4]