हूँ तो चेरी राधे कौ, नाम रटूँ राधे कौ,
सुमिरन नित राधे कौ राधे कौ ध्यान जू। [1]
भजन करूं राधे कौ, इष्ट रखूँ राधे कौ,
उपास मेरैं राधे कौ, राधिका ही प्राण जू॥ [2]
तन मन कर आठौं जाम, आस राधे की मोकों,
आसरौ राधे कौ और ना पहिचान जू। [3]
कल्यान की करता और हरता है चिन्ता की,
'लालदास' वारी तापै निश्चै यहि जान जू॥ [4]
- श्री लालदास (शुक सम्प्रदाय के रसिक संत)
मैं तो केवल श्री राधा की ही चेरी (दासी) हूँ। हर क्षण श्री राधे का ही नाम रटती हूँ, श्री राधे का ही सुमिरन करती हूँ और श्री राधा का ही ध्यान करती हूँ। [1]
मैं श्री राधा का ही भजन करती हूँ। मेरी इष्ट भी श्री राधा हैं, मेरी उपासना भी श्री राधा की ही है, और श्री राधिका ही मेरे प्राण हैं। [2]
आठों याम तन-मन से मुझे केवल राधा की ही आस है। मेरा आसरा भी श्री राधा ही हैं, और इसके अतिरिक्त मेरी अन्य किसी से कोई पहचान नहीं है। [3]
श्री राधा ही कल्याण करने वाली हैं और समस्त चिंताओं को हरने वाली हैं। श्री लाल दास जी सखी-स्वरूप में स्थित होकर कहते हैं कि मैं निश्चित ही श्री राधा पर अपना सब कुछ न्योछावर करती हूँ। [4]
सुमिरन नित राधे कौ राधे कौ ध्यान जू। [1]
भजन करूं राधे कौ, इष्ट रखूँ राधे कौ,
उपास मेरैं राधे कौ, राधिका ही प्राण जू॥ [2]
तन मन कर आठौं जाम, आस राधे की मोकों,
आसरौ राधे कौ और ना पहिचान जू। [3]
कल्यान की करता और हरता है चिन्ता की,
'लालदास' वारी तापै निश्चै यहि जान जू॥ [4]
- श्री लालदास (शुक सम्प्रदाय के रसिक संत)
मैं तो केवल श्री राधा की ही चेरी (दासी) हूँ। हर क्षण श्री राधे का ही नाम रटती हूँ, श्री राधे का ही सुमिरन करती हूँ और श्री राधा का ही ध्यान करती हूँ। [1]
मैं श्री राधा का ही भजन करती हूँ। मेरी इष्ट भी श्री राधा हैं, मेरी उपासना भी श्री राधा की ही है, और श्री राधिका ही मेरे प्राण हैं। [2]
आठों याम तन-मन से मुझे केवल राधा की ही आस है। मेरा आसरा भी श्री राधा ही हैं, और इसके अतिरिक्त मेरी अन्य किसी से कोई पहचान नहीं है। [3]
श्री राधा ही कल्याण करने वाली हैं और समस्त चिंताओं को हरने वाली हैं। श्री लाल दास जी सखी-स्वरूप में स्थित होकर कहते हैं कि मैं निश्चित ही श्री राधा पर अपना सब कुछ न्योछावर करती हूँ। [4]

