(राग मल्हार)
प्यारी के गावत कोकिला मुख मूँदि रही,
पिय के गावत खग नैना मूँदि रहे सब। [1]
नागरी के रस गिरिधरन रसिकवर,
मुरली राग मल्हार अलाप्यो मधुरे जब॥ [2]
दंपती तान बंधान सुनहिं ललितादिक,
वारहि तन मन फेरहिं अंचल तब। [3]
‘चतुर्भुज’ प्रभु कों निरख सुख दंपती,
कहत कहा धौं कीजै भवन अब॥ [4]
- श्री चतुर्भुजदास जी
प्यारी श्री राधा जब गाती हैं, तब कोयल अपना मुख बंद कर लेती है, और जब श्री कृष्ण गाते हैं, तब पक्षीगण अपने नेत्र बंद कर लेते हैं। [1]
प्यारी के गावत कोकिला मुख मूँदि रही,
पिय के गावत खग नैना मूँदि रहे सब। [1]
नागरी के रस गिरिधरन रसिकवर,
मुरली राग मल्हार अलाप्यो मधुरे जब॥ [2]
दंपती तान बंधान सुनहिं ललितादिक,
वारहि तन मन फेरहिं अंचल तब। [3]
‘चतुर्भुज’ प्रभु कों निरख सुख दंपती,
कहत कहा धौं कीजै भवन अब॥ [4]
- श्री चतुर्भुजदास जी
प्यारी श्री राधा जब गाती हैं, तब कोयल अपना मुख बंद कर लेती है, और जब श्री कृष्ण गाते हैं, तब पक्षीगण अपने नेत्र बंद कर लेते हैं। [1]
श्री राधा जब राग मल्हार में गाती हैं, तब गिरिधर रसिकवर श्री श्यामसुंदर प्यारी के रस में निमग्न होकर उसी राग में मधुर वंशी का वादन करते हैं। [2]
नित्य दंपति श्री श्यामाश्याम के मधुर गान को सुनकर ललितादिक सखियाँ अपने तन-मन-प्राण उन पर न्योंछावर करती हैं। [3]
नित्य दंपति श्री राधा कृष्ण की सुखमय छवि को देखकर श्री चतुर्भुजदास जी कहते हैं, "अब इस सुख का कहाँ तक वर्णन करूँ? कृपाकर मुझे अपनी शरण में लीजिए।" [4]

