सुनि व्यवहारिक नाम को ठाढे दूरि उदास - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी

सुनि व्यवहारिक नाम को ठाढे दूरि उदास - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी

सुनि व्यवहारिक नाम को, ठाढे दूरि उदास ।
दौरि मिले भरि नैन पुनि, सुनत नागरीदास ॥

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी

श्री नागरीदास जी वर्णन करते हैं कि जब वे वृन्दावन पहुँचे और लोग उन्हें किशनगढ़ के राजा के रूप में पहचानते थे, तब कोई विशेष स्वागत हेतु नहीं आया; पर जैसे ही उन्होंने स्वयं को “नागरीदास” (अर्थात् राधारानी का दास) कहलवाया, समस्त रसिकजन प्रेमविभोर होकर दौड़ते हुए उन्हें दोनों भुजाएँ फैलाकर मिलने आए।