रसिक निमिष नहिं बीछुरैं, ना दुरि बैठें और ।
एतो माँन बिहार में, मुरत नैंन की कोर ॥
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (1)
हमारे रसिक बिहारी-बिहारिनी एक क्षण के लिए भी परस्पर से अलग नहीं होते और कहीं दूर भी नहीं बैठते। इस दिव्य विहार में मान केवल इतना-सा होता है कि नयनों की कोर से हलका-सा दुराव प्रकट हो जाता है।

