(राग मल्हार)
सावन प्रेम संपदा लायौ ।
हरित भरित फल फूल विपिन रँग मोरन मंगल गायौ ॥ [1]
चातक पिउ-पिउ करत ललकि रट कोकिल शब्द सुनायौ ।
यों जहाँ-तहाँ निरभर हरियारी अवनि सिंगार बनायौ ॥ [2]
चपला चमकि-चमकि अति लाघव चहुँ दिसि तें घन छायौ ।
विलसत जुगल सेज सुख की निधि देखि कली जस गायौ ॥ [3]
- श्री कल्याण पुजारी जी, श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (168)
सावन (वर्षा) ऋतु प्रेम-सम्पदा लेकर आयी है । श्री वृन्दावन में हरियाली व्याप्त हो गयी है और वृक्ष फल-फूल से भर गए हैं, मोर मधुर स्वर में गा रहे है । [1]
चातक 'पीहु पीहु' कर चहक रहे हैं और कोयल मधुर शब्द कर गा रही है । जहाँ-तहाँ सुन्दर हरियाली से धरती ने अद्भुत श्रृंगार किया है । [2]
हल्की-हल्की बिजली चमक रही है और मेघ चारों दिशाओं में छाए हुए हैं । सुख की निधि श्री राधा कृष्ण सुन्दर सेज पर विलस रहे हैं । इस लीला का दर्शन कर श्री कल्याण पुजारी जी उनके यश का गान कर रहे हैं । [3]
सावन प्रेम संपदा लायौ ।
हरित भरित फल फूल विपिन रँग मोरन मंगल गायौ ॥ [1]
चातक पिउ-पिउ करत ललकि रट कोकिल शब्द सुनायौ ।
यों जहाँ-तहाँ निरभर हरियारी अवनि सिंगार बनायौ ॥ [2]
चपला चमकि-चमकि अति लाघव चहुँ दिसि तें घन छायौ ।
विलसत जुगल सेज सुख की निधि देखि कली जस गायौ ॥ [3]
- श्री कल्याण पुजारी जी, श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (168)
सावन (वर्षा) ऋतु प्रेम-सम्पदा लेकर आयी है । श्री वृन्दावन में हरियाली व्याप्त हो गयी है और वृक्ष फल-फूल से भर गए हैं, मोर मधुर स्वर में गा रहे है । [1]
चातक 'पीहु पीहु' कर चहक रहे हैं और कोयल मधुर शब्द कर गा रही है । जहाँ-तहाँ सुन्दर हरियाली से धरती ने अद्भुत श्रृंगार किया है । [2]
हल्की-हल्की बिजली चमक रही है और मेघ चारों दिशाओं में छाए हुए हैं । सुख की निधि श्री राधा कृष्ण सुन्दर सेज पर विलस रहे हैं । इस लीला का दर्शन कर श्री कल्याण पुजारी जी उनके यश का गान कर रहे हैं । [3]

