ब्रज में प्रवेश करते ही कर्ण कुहरों में - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (2)

ब्रज में प्रवेश करते ही कर्ण कुहरों में - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (2)

ब्रज में प्रवेश करते ही कर्ण कुहरों में,
करती प्रवेश ध्वनि राधे राधे श्याम की। [1]
ज्यों ज्यों पग आगे पड़ते पवित्र पत्तनों में,
सुनते सरस ब्रज-भाषा ग्राम ग्राम की॥ [2]
पथ पथ में करीलों के कलित कुंज सोहैं,
सहसा सुध आ जाती प्यारे घनश्याम की। [3]
छाती भर आती हाय! गरिमा गुणों की देख,
महिमा विदित होती वृन्दावन धाम की॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (2)

ब्रजधाम में प्रवेश करते ही कानों में श्री राधे-श्याम की मधुर ध्वनि गूँजने लगती है, जो मन को आनंदमय कर देती है। [1]

जैसे-जैसे इस पावन धाम में कदम बढ़ते हैं, वैसे ही ग्राम-ग्राम में सरस और मधुर ब्रजभाषा की मिठास आत्मा को स्पर्श करती है। [2]

प्रत्येक पथ पर रमणीय करील की कुंजें अपनी अद्भुत शोभा बिखेर रही हैं, जिन्हें देख सहसा प्रिय श्यामसुंदर की मनोहारी छवि स्मरण हो आती है। [3]

डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’ जी कहते हैं कि इस दिव्य भूमि के गुण-वैभव और गरिमा को देखकर हृदय भाव-विभोर हो उठता है, और श्री वृंदावन की अलौकिक महिमा का सजीव अनुभव होने लगता है। [4]