वृन्दावन रस भूमि यह, पेंड पेंड पर भेद ।
खारौं मीठौ मरमरौ, यहै समुझि भ्रम छेद ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (502)
वृन्दावन की यह भूमि रस-सिद्ध और अत्यंत गूढ़ है, जहाँ रस-उपासना में प्रत्येक चरण पर सूक्ष्म भेद प्रकट होते हैं। किसी को कोई रस खारा प्रतीत होता है, किसी को मीठा और किसी को मरमरा; अतः एक सच्चे रसिक को अपने भ्रमों का त्याग कर इसे ठीक से समझना चाहिए और जिस रस में उसका हृदय स्थिर और तृप्त हो, उसी को पूर्ण निष्ठा से अपनाना चाहिए।
खारौं मीठौ मरमरौ, यहै समुझि भ्रम छेद ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (502)
वृन्दावन की यह भूमि रस-सिद्ध और अत्यंत गूढ़ है, जहाँ रस-उपासना में प्रत्येक चरण पर सूक्ष्म भेद प्रकट होते हैं। किसी को कोई रस खारा प्रतीत होता है, किसी को मीठा और किसी को मरमरा; अतः एक सच्चे रसिक को अपने भ्रमों का त्याग कर इसे ठीक से समझना चाहिए और जिस रस में उसका हृदय स्थिर और तृप्त हो, उसी को पूर्ण निष्ठा से अपनाना चाहिए।

