श्री वल्लभरसिक जी की जीवनी

श्री वल्लभरसिक जी की जीवनी

जन्म :
श्री वल्लभरसिक जी का जन्म अनुमानतः 1600 के लगभग हुआ है । इनके पिता श्री गदाधर भट्ट जी थे जो एक महान गौड़ीय भक्त हुए हैं  । इनके बड़े भ्राता श्री रसिकोत्तंस थे, जिनकी रचना 'प्रेम-पत्तनम्' प्रसिद्ध है । 

दीक्षा :
श्री वल्लभरसिक जी ने अपने पिता, महान गौड़ीय रसिक भक्त श्री गदाधर भट्ट जी से दीक्षा ग्रहण की थी । 

श्री वल्लभरसिक जी की वाणी का प्रतिपाद्य :
वल्लभरसिक जी की वाणी का प्रधान प्रतिपाद्य श्री प्रिया-प्रियतम का लीला-विहार ही है । इनकी भावना और शैली वृन्दावन के अन्य रसिकों के साथ विशेष रूप से मिलती है जो विशेषकर सखी एवं सहचरी भाव के हैं । वल्लभ-रसिक जी ने उसी एक रस का जो वृन्दावनीय रसिकों का गेय है, गान किया है । वियोग का ये कभी नाम भी नहीं लेते । निकुञ्ज की अन्तरंगलीला में ये इतने पगे हैं कि कभी कुंज-महल का आंगन उलांघना भी नहीं जानते ।
श्रीकृष्ण के अन्य सब चरित्रों को छान कर इन्होंने केवल वृन्दावन रस ही ग्रहण किया है । इसके लिए यदि वन के निवासी उनकी निन्दा भी करते हैं तो वल्लभरसिक जी को आनन्द ही होता है -

हम जुगल महल रस लिंदा,
कुंज अलिंदा उलंघि न जानैं । [1]
रस दारिंदा वृन्दावनगण
चरितन हू गहि छानैं ॥ [2]
वन के वासिंदा सब निंदा करें,
सु को मन आनैं ? [3]
वल्लभरसिक चुनिंदा बिन को
निन्दा सुख पहिचानैं ॥ [4]
- श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (23)

श्री वल्लभरसिक जी के ह्रदय की स्थिति :
वल्लभरसिक जी निकुञ्ज रस के छके रसिक हैं । वे प्रिया-प्रिय को अंक में भर-भरकर लिपटाते हैं, आनन्दित होते हैं । वे जानते हैं कि उनके प्रिया-प्रिय की देह विशुद्ध प्रेम का प्रकाश है, समस्त जग भी उसी प्रेम से प्रकाशित है । जिन रसिकों ने उस श्यामगौर शरीर का स्पर्श किया है, स्नेह से उनके रोम-रोम चिकने हो गये हैं । वे प्रिया प्रियतम के वृंदावन रस में ऐसे मतवारे हो गए कि इन्हें लोक वेद की कुछ परवाह ही न थी ।
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आठौ पहर रहैं मतवारे । 
लोक वेद इन सबै बिसारे ॥
खेलनि में षेलें । 
दोउन की झेलनि रस झेलें ॥

इन रसिक लाल-लाडिली के प्रेम में जो दाग लगाते हैं, वे नरपशु हैं, वल्लभरसिक उनकी बातें भी नहीं सुनना चाहते, वे निश्शंक होकर प्रिया-प्रिय को अंक में भर लेते हैं ।

जिनके देह नेह परिपूरण ते जगमगात जग मांहीं ।
जिन दरसें जिन परसे चिकने रोम रोम ह्वै जाहीं ॥
नरपसु दाग लगन उर जिनकी बातें सुनत डराहीं ।
वल्लभरसिक निसंक अंक भरि भरि तिन सों लपटाहीं ॥

रचना :
श्री वल्लभरसिक जी के पदों का संकलन श्री वल्लभरसिक जी की वाणी में पिरोया गया है । वल्लभरसिक जी के काव्य में युगल उपासना का सुदृढ़ सुन्दर सिद्धान्त वर्णित है । साथ ही हिंडोरा, पवित्रा, वर्षगांठ, सांझी, दशहरा, दिवाली, होली, बसन्त, फूलडोल, चन्दनयात्रा, रथयात्रा, रास की मांझ, गुलाब की मांझ, जल क्रीडा, वर्षा, सुरत-उल्लास और नित्योत्सव के पदों का गान उन्होंने किया है । लीला-गान में उन्होंने अपने को प्रायः सखी रूप में ही प्रस्तुत किया है, और वल्लभ-रसिक-सखी नाम रखा है ।
वल्लभरसिक जी की समस्त प्राप्त वाणियों का एक संकलन बाबा कृष्णदास जी द्वारा प्रकाशित किया जा चुका है ।

काव्य गंभीरता :
वल्लभरसिक जी के काव्य का बाह्य पक्ष भी उतना ही चमत्कारपूर्ण है, जितना पुष्ट उनका आन्तरिक पक्ष है । कविता में भाषा का लालित्य और यमक, अनुप्रासादि की ऐसी छटा सर्वत्र बिखरी है कि इनका भाषा पर सहज अधिकार परिलक्षित होता है । साधारण पढ़े लिखे लोगों के लिए इनकी कविता एक पहेली भी बन सकती है, परन्तु जो रस और काव्य के मर्मज्ञ हैं, वे जान सकते हैं कि किस प्रकार वल्लभरसिक जी अपनी अनुभूतियों और भावों की पर्तों को एक के बाद एक खोलते चले जाते हैं ।उनकी अनुभूति अत्यन्त सूक्ष्म और तीव्र है । कहीं-कहीं उनकी कविता अपनी इसी सूक्ष्मता के कारण घनानंद की तरह बौद्धिक भी हो गई है। 'बारह बाट अठारह पैंडे' में कवि ने अपनी उपासना, रसिक रूप और सखी-सुख का वास्तविक परिचय दिया है । वे कहते हैं -

वल्लभरसिक सहचरी वानी । जुगल लगन आसव सों सानी |
मदमतवारी अंखियनि बांचौ । मदमतवारे की अंखियनि बांचौ ।

श्री श्यामाश्याम के प्रेम का दर्शन :
प्रिया-प्रिय के परस्पर प्रेम का आधार है प्रियके हृदय का लोभ और प्रिया के तन की कान्ति । वल्लभरसिक जी ने कहा है कि प्रिय के शरीर का अंग-अंग प्रिया के शरीर का लोभी है, और प्रिया के शरीर की सुंदर गोभा तो है ही । इस गोभ और लोभ की बात ही विलक्षण है -

लोभ सने सब अङ्ग पिया के ।
गोभ सने सब अङ्ग तिया के |
गोभ लोभ सों अनि ही सनी ।
लोभ लगन बाननि की अनी ।

श्री वल्लभरसिक जी के नेत्रों का सुख :
युगल की प्रेम-क्रीड़ा परस्पर की एकरसता में चलती है । रूप के फुहारों में मन छूट कर भी बंध जाता है । वल्लभरसिक इसी में नेत्रों का सुख लूटते हैं -

नैन फुहारे रूप के, रूप-रूप बंधि जाहिं ।
इनकी छूटनि में बंधनि, फिर नैननि का आहिं ।
छूटि बंधनि में बंधि-बंधि छूटैं।
वल्लभरसिक नैन-सुख लूटैं ।

रचनाएँ :
वल्लभरसिक जी द्वारा रचित वल्लभरसिक जी की वाणी आनन्द की स्त्रोतस्विनी है, जिसका अखंड प्रवाह रसिकों और साहित्यिकों को समान रूप से आप्लावित कर सकने में समर्थ है । नीचे उनका एक पद उदाहरणार्थ दिया जाता है, जिसमें रति-रस में झूलने वाले प्रिया-प्रिय के साथ ही वल्लभरसिक सखी के नेत्र भी झूल रहे हैं -

आजु दोऊ झूलन रति रस सानें ।
ठाडे सचकैं लचकि तरूनि के, गहि फल-फूलहिं आने ॥
सूहे पट पहरैं द्वै पटुली, बैठे सामल गोरी ।
अलिनु रंगीली तिय पद अंगुली पिय डोरी सँग जोरी ॥
श्याम काम बस झूलि-झूलि पग मूलनि झुलनि बढाहीं ।
कामिनि चरण तानरस छुटि अलि काम लूटि मचि जाहीं ॥
जोवन मधि जोवन-मद झलए झूलनि फंदनि जाने ।
'वल्लभरसिक' सखी के नैना एही झुलनि झुलाने ॥