राजत दंपति कुंजमहल में - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (519)

राजत दंपति कुंजमहल में - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (519)

(राग बिहागरो)
राजत दंपति कुंजमहल में ।
बनि ठनि बैठे एक सेज पर डारे भुजा परस्पर गल में ॥ [1]
करत बिनोद महा रँगभीने आनंद सहित पिय प्यारी ।
‘गोविंद' दास कहाँ लौं बरनों राजत अति राधा गिरिधारी ॥ [2]

- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (519)

नित्य दंपति श्री श्यामाश्याम कुंजमहल में विराजे हैं । समस्त श्रृंगार से परिपूर्ण दोनों एक सेज पर एक-दूसरे के कंठ में भुजा डाले बैठे हैं । [1]

महाप्रेम के रंग में भीगे दोनों हास परिहास एवं विनोद कर आनंद की वर्षा कर रहे हैं । श्री गोविंद स्वामी कहते हैं कि मैं कहाँ तक वर्णन करूं, श्री राधा गिरिधारी कि शोभा सुंदरता की सीमा है । [2]