हो रसिया, मैं तो सरन तिहारी।
नहिं साधन बल वचन चातुरी,
एक भरोसो चरन गिरधारी।
कडुई तुंबरिया मैं तो नीच भूमि की,
गुन सागर पिया तुमहि सँवारी॥ [1]
मैं अति दीन बालक तुम सरने,
नाथ न दीजै अनाथ बिसारी।
निज जन जानि सँभारोगे प्रियतम,
'प्रेम सखी' नित जाउँ बलिहारी॥ [2]
- श्री प्रेम सखी जी
हे रसिया, मैं आपकी शरण में आया हूँ। मेरे पास न साधना का बल है न वचन चातुरी, हे गिरधारी, मुझे तो एकमात्र आपके चरण कमलों का ही भरोसा है।
मैं पतित हूँ, लेकिन आप तो गुणों के सागर हो; हे श्री कृष्ण, केवल आप ही मेरे बिगड़े हुए जीवन को सँवार सकते हो। [1]
हे नाथ! मैं अति दीन बालक आपकी शरण में आया हूँ, मुझ अनाथ को भुला न देना।
प्रेम सखी जी कहते हैं कि हे प्रियतम, मुझे अपना निज जन समझकर मेरी संभाल कीजिये, मैं नित्य आपकी बलिहारी हूँ। [2]
नहिं साधन बल वचन चातुरी,
एक भरोसो चरन गिरधारी।
कडुई तुंबरिया मैं तो नीच भूमि की,
गुन सागर पिया तुमहि सँवारी॥ [1]
मैं अति दीन बालक तुम सरने,
नाथ न दीजै अनाथ बिसारी।
निज जन जानि सँभारोगे प्रियतम,
'प्रेम सखी' नित जाउँ बलिहारी॥ [2]
- श्री प्रेम सखी जी
हे रसिया, मैं आपकी शरण में आया हूँ। मेरे पास न साधना का बल है न वचन चातुरी, हे गिरधारी, मुझे तो एकमात्र आपके चरण कमलों का ही भरोसा है।
मैं पतित हूँ, लेकिन आप तो गुणों के सागर हो; हे श्री कृष्ण, केवल आप ही मेरे बिगड़े हुए जीवन को सँवार सकते हो। [1]
हे नाथ! मैं अति दीन बालक आपकी शरण में आया हूँ, मुझ अनाथ को भुला न देना।
प्रेम सखी जी कहते हैं कि हे प्रियतम, मुझे अपना निज जन समझकर मेरी संभाल कीजिये, मैं नित्य आपकी बलिहारी हूँ। [2]

