बक विषयीजन परस इहि, वेऊ विमल ह्वै जाउ ।
जानी अजानि लगै जु, अय पारस करै प्रभाउ ॥
- श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा
जिस प्रकार पारसमणि के स्पर्श से लौह-धातु भी स्वर्ण-रूप में परिवर्तित होने लगती है, चाहे वह स्पर्श जान-बूझकर किया गया हो या अनजाने में, उसी प्रकार भक्तों का ही नहीं, यदि घोर विषयी जन भी इस वृन्दावन-रस की भक्ति का स्पर्श प्राप्त करते हैं, तो उनका हृदय भी परिवर्तित (शुद्ध) होने लगता है।
जानी अजानि लगै जु, अय पारस करै प्रभाउ ॥
- श्री वृंदावन देवाचार्य, गीतामृत गंगा
जिस प्रकार पारसमणि के स्पर्श से लौह-धातु भी स्वर्ण-रूप में परिवर्तित होने लगती है, चाहे वह स्पर्श जान-बूझकर किया गया हो या अनजाने में, उसी प्रकार भक्तों का ही नहीं, यदि घोर विषयी जन भी इस वृन्दावन-रस की भक्ति का स्पर्श प्राप्त करते हैं, तो उनका हृदय भी परिवर्तित (शुद्ध) होने लगता है।

